महापराक्रमी, अजर-अमर बनाफर राजपूत वीर योद्धा के 880 वें अवतरण दिवस (25 मई 1140 ) विशेष - mithila Hindi news

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महापराक्रमी, अजर-अमर बनाफर राजपूत वीर योद्धा के 880 वें अवतरण दिवस (25 मई 1140 ) विशेष

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काली सुमिरि करौली वाली
गुरु अमरा के चरण मनाइ ।
ललिता देवी नीमसार की
भूले अक्षर देहु बताय।।
गरुई गाजैं रन बाघन की
हमरी कलम रही थर्राय।।
बड़े लड़इया महुबे वाले
जिनकी मार न बरनी जाय।।

अनूप नारायण सिंह 

यह कहानी है, बुंदेलखंड के दो महान शूरवीरों की, यह कहानी उस समय की है, जब दिल्ली के राजसिंहासन पर दिल्ली के महाराज पृथ्वीराज चौहान विराजमान थे । उन्होंने अपन्स आसपास के लगभग सभी राजाओ को अपने अधीन कर लिया था , लेकिन कन्नोज के राजा जयचंद ओर कलिंजर के राजा चंदेल परमालदेव ने पृथ्वीराज की अधीनता स्वीकार नही की । राजा परमालदेव का विवाह उरई के राजा की बेटी " मलहना " के साथ हुआ था । मलहना की दो छोटी बहन भी थी," देवल दे " ओर " तिलका " , जिनका विवाह राजा परमालदेव के दो वीर सेनानायक ओर ओर दक्षराज ओर ओर वत्सराज के साथ हुआ ।

इस विवाह से रानी मलहना इतनी खुश हुई, की उन्होंने वत्सराज ओर दक्षराज के लिए अलग अलग अपने महल से भी ज़्यादा सुंदर महल बनाये । उन्ही दिनों राजा परमालदेव ने महोबा को अपनी नयी राजधानी घोषित किया था । चन्देलराज की इस पावनभूमि मे एक ही समय मे लगभग पांच पुत्रो का जन्म हुआ , जो आगे चलकर महोबा के पंचवीर कहलाये । 

राजकुमारी मलहना की कोख से राजकुमार ब्रह्मकुमार का जन्म हुआ, ब्रह्मकुमार एक शूरवीर योद्धा थे । राजा परमालदेव के पुरोहित के घर "धीवा " पैदा हुए । धीवा वीर तो थे ही, साथ मे ज्योतिष विद्या में भी निपुण थे, धीवा को आल्हा खण्ड में विपत्ति का साथी कहा गया है । उसने हर विपत्ति में अपने मित्रों का साथ निभाया । 

धीवा पुरोहित के बारे में आल्हा गाने वाले आज भी गाते है -:-
"विपत्ति में तो धीवा है, ऐसो मित्र मिलन को नाय "

इधर सिरसा में तिलका ने " मलखान " नाम के एक पुत्र को जन्म दिया, कहते है मलखान का शरीर लोहे के जैसे कठोर था, ओर युद्ध भूमि में वह अंगद की तरह पांव जमाकर लड़ता था । 

कहते है .....

"पांव पिछाड़ी टेक ना जाणे, जंघा टेक लड़े मलखान "

यानी युद्ध करते समय, वह पाँव को पीछे नही जाने देता था , ओर अपनी जांघों को टेक कर लड़ता था मलखान । 

इधर दहसरपुरवा में देवल दे भी एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम आल्हा रखा गया । आल्हा के बाद देवल दे एक बार फिर से गर्भ से हो गयी, ओर तभी जब वो गर्भ से थी, तो एक दिन मांडोगढ़ के बघेल राजा ने महोबा पर आक्रमण कर दिया । इस आक्रमण के लिए कोई तैयार नही था, इस आक्रमण ने इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया, इस इतिहास ने एक नए समीकरण को जन्म दिया ।

मांडोगढ़ के राजा ने दक्षराज ओर वत्सराज को कैद कर लिया, उन्हें बंदी बनाकर वो मांडोगढ़ ले गया ,लेकिन इसपर भी बघेल राजा की क्रूरता का अंत नही हुआ, उसने दोनो भाई दक्षराज ओर वत्सराज को मारकर उनका सिर काट बरगद के पेड़ पर टांग दिया । 

"टंगी खुपड़िया है बरगद पर , बरखा , हो या शीत को नाम
आधी बेला की रतिया में , रो रो ले, आल्हा को नाम "

पिता की मौत के कुछ महीनों बाद उदल का जन्म हुआ , कहते है ....

"जै दिन जन्म हुआ उदल का, धरती धंसी अढ़ाई हाथ " 
यानी जिस दिन उदल का जन्म हुआ, उदल के भार से धरती ढाई हाथ नीचे धंस गयी । लेकिन उदल की माता देवलदे खुश ना थी ...

" मत दो इसे मेरी गौद में, कुलनाशक है यह " 

देवल दे, एक माँ होकर अपने बेटे के बारे में ऐसा कहती हो ? मलहना ने देवल दे को समझाया । 

यदि ऐसा ना होता मलहना, तो पेट मे आने के तीन महीने बाद ही इसके पिता की म्रत्यु नही होती । 

इसमे इस बच्चे का क्या दोष ? यह तो नियति है !

जिसने अपने पिता का मुंह तक नही देखा, जिसके जन्म लेते ही भूकम्प आ गया, वो कुलनाशक नही तो ओर क्या है ?

देवलदे, तुम कटु हो गयी हो, तुमसे बहस का कोई मतलब नही है ।

अगर आप यह समझ ही गयी है , तो मुझे अकेले छोड़ने का कष्ठ करें ।

हां, बिल्कुल, आज से तुम नही, में इस बच्चे की माँ हूँ । अपने साथ ले जा रही हूं इसे , पर एक बात याद रखना देवलदे, आगे चलकर यही बालक राज्य का नाम रोशन करेगा । ओर अपने पिता की मौत का बदला लेगा ।

" धर्म की माता है मलहने, जो उदल को लियो बचाये " 

राजा परमालदेव ने पांचों वीर, आल्हा, उदल, मलखान, ब्रह्मकुमार ओर धीवा को एक साथ पढ़ाया लिखाया, तथा अस्त्र शस्त्र को चलाने की शिक्षा दी । देखते ही देखते पांचों बालक अपनी किशोरावस्था पर कर गए, साथ ही साथ इनकी बहादुरी के किस्से पूरे प्रान्त में फैल गए । इन सब मे उदल की वीरता से राजा परमालदेव बहुत प्रभावित थे । 

एक दिन वो राजदरबार में बैठकर उदल की वीरता की चर्चा अपने सभासदों से कर रहे थे, की तभी आल्हा उदल का मामा माहिल , वहां आ धमका, माहिल ने महाराज की बातें सुनी, ओर महाराज से कहने लगा ; 

" क्षमा करें महाराज, उदल तो साधरण सिपाही है, वो कब से तलवार भांजने लगा, माना कुछ छोटे मोटे युद्ध जीत लिए होंगे उदल ने, किन्तु छोटे मोटे युद्ध जितने से कोई शूरवीर तो नही बन जाता, उदल तो एक साधरण सिपाही है महाराज । " 

माहिल -- अपनी सीमाएं मत भूलो ...

क्षमा महाराज, अगर उदल वीर ही होता, तो मांडुगढ़ में उसके बाप का सिर आज तक टँगा ना होता । जब तक दक्षराज ओर वत्सराज का सिर मांडोगढ़ से लाकर उसका अंतिम संस्कार नही कर दिया जाता, जब तक उनकी आत्मा को मुक्ति नही मिलेगी । अगर उदल वीर है, तो इस कार्य को पूरा करके दिखाए ।

क्यो की ---- बाप का बैरी जो ना मारे, तोकर मांस गिद्ध ना खाएं ।

यानी, तो बाप के शत्रु का वध नही कर सकता, उसका मांस तो गिद्ध भी नही खाता ।

दरबार मे अचानक बहुत समय से उदल यह सब बातें सुन रहे थे, वो कब आये, किसी को पता तक नही था, उदल को देखते ही सारी सभा मे सन्नाटा फैल गया ।

कहते है न, चुनोतियाँ अगर खुद चलकर शूरवीरों के पास नही आती, तो शूरवीर खुद चलकर चुनोतियो के पास पहुंच जाते है ।

तुम यही चाहते थे न माहिल ... की इन दोनों भाइयों की खोपड़ी भी वहीं टँगी मिले ? परमालदेव बोले ।

अभी तो आप उदल की शूरवीरता के किस्से सुना रहे थे, जब शूरवीरता सिद्ध करने का समय आ गया है, तो किस बात का भय ?

सच उदल के सामने आ चुका था, वे एक क्षण के लिए भी राजदरबार में नही रुके । 

अपनी माँ के पास जब उदल गए, तो माँ ने कहा ...

टँगी खुपड़िया बाप चचा की
मांडोगढ़ बरगद की डार
आधी रतिया की बेला में
खोपड़ी कहे पुकार- पुकार
कहवा आल्हा, कहवा उदल, 
कहवा मलखे लडते लाल
बचके आना मांडोगढ़ में
राज बघेल जीवता काल
अरे बेटा अभी उम्र है बारी भोरी
खेलो खाओ दूध और भात
चढ़े जवानी, तब वाहन पर
तब जाके बघेल को मार

बेटा अभी यह युद्ध मत करो, अभी उम्र ही क्या है तुम्हरी ? दिवला ने आंसू बहाते हुए कहा ...की अभी युद्ध मत करो उदल, पहले कुछ बड़े हो जाओ .... 

ऐसा गरजा है दिवला का
जैसे बिजली कौंधा खाय
भुजा उठाकर अब उदल ने
ओर माता से कहा सुनाये
मत घबरावे तू माता 
मांडोराज को मैं देखूं जाय
वंश सहित बघेल को मारूं
नाम मेरा उदलचन्द राय
मार के मांडो नरघा कर दूं
पक्का ताल देउँ बनवाए
खाल खींचकर भूंस भरवा दूँ
ऊपर दायं देउँ चलवाये
आग लगा दूँ में मांडो को
सबका देयु तेल कढ़वाय
बाप के बदले शीश मांडो का
महोबे में देयु लटकाए

देवल दे को लगा, अब यह मलहना के अलावा किसी के काबू में नही आ सकता । 
जब मलहना आयी तो, दिवला उदल को लेकर रोये जा रही थी, उन्हें डर था, कहीं उदल भी मांडोगढ़ में मारा ना जाये ..

मलहना के पांव में पड़कर देवल दे रोने लगी, की में अपने पति को खो चुकी, अब दोनो बेटों को नही खोना चाहती ..

इस पर जवाब दिया उदल ने
माता सुन ले कान लगाय
करी प्रतिज्ञा जो मेने है
वो बिल्कुल टलने की नाय
ज्ञानी रोवे ध्यान लगाकर
उसका ध्यान भंग हो जाय
बालक रोवे भूख का मारा
माता देख पूत का घाय
कुत्ता , सियार , बिलाई रोवे
असगुन की घड़ियों को पाय
रोवे चोर दरोगा लेकर
जब उसको थाने ले जाय
तिरिया रोवे सुनी सेज पर
जो पति बसे समुन्दर पार
रंडुआ रोवे शीश पटककर
सुन सुन बिछुवन कि झनकार
तू क्यो रोवे मेरी माता
तुझको कौन पड़ी परवाह
जब तक तेरा लाल हजारी
जीवे धवल उदलचन्द राय
मत धीरज अपना खो माता
तुझको देउँ साफ बतलाए
मैं मारूंगा, राज बघेल को
बाप का बदला लेउ चुकाए ...

मलहना ने समझ लिया, उदल अब नही मानेगा ....महलना ने देवलदे को उपर उठाया और उदल की ओर देखा -- " मेरे बेटे ने पहली बार युद्ध मे जाने की इच्छा जाहिर की है देवल दे , मैं उसे नही रोकूंगी । अपने प्राण का मोह तो कायर ओर मूर्ख करते है ।

बेटा उदल ... महलना ने कहा, शत्रु चाहे जो करें, तुम हमेशा धर्मयुद्ध करना, कभी किसी से डरना नही, बालक, बूढ़े, ओर स्त्री पर कभी हाथ नही लगाना, युद्ध मे जिज़ सैनिक के पास हथियार ना हो, उसपर वार मत करना, कभी शत्रु से पहले हथियार ना चलाना । 

अपनी धर्ममाता की सीख को गांठ मार उदल उदल राजा उदल आल्हा के पास आज्ञा लेने पहुंच गए ।

आल्हा ने उदल के मुंह से जब मांडोगढ़ कि बात सुनी तो 

आल्हा गया सनाका खाय
नीचे का दम नीचे रह गया
उपर ले गया राम उठाय
बोला आल्हा तब ललकारा
भइया मेरे उदलचन्द राय
भला बुरा तुम्हे ना सूझे
कोरी शान रहे जतलाय

आल्हा ने उदल से कहा, हमे ज़्यादा उछलने कूदने की जरूरत नही है, मांडोगढ़ एक मजबूत दुर्ग है, उसे भेद पाना असंभव है ....

इतनी बात सुनी आल्हा की
उदल कालवरण हो जाय
उछल के उदल ठाड़ो है, 
नंगी सुंत लेई तलवार
धरि अवतार है उदल ने
भैया मण्डलिक अवतार
मूंछ रखाई किस बूते पर
इसको क्यो न देओ मुंडवाए
लानत ऐसी रजपूती पर
तेगा बाँधन को धिक्कार
पाघ लपेटन को लानत है
जो ऐसा करते इजहार
जो तुम डरते रणखेतो से
तो फिर बैठो रंगमहल में जाय
इक्ला उदल गढ़ मांडो का
पक्का ताल देई करवाए
जो न लेवे बाप का बदला
ओकर मांस गिद्ध ना खाय
बदला लेयूँ बाप - ताऊ का
पीछे कदम धरूँगा नाय
जो में छोरा एक बाप का
तो राज बघेल को दयूं मिटाए

पानी देवा नाम न लेवा
जीवत किसी को छोड़ूं नाय
जैसे रांड बनी मेरी माता
तैसी घर घर देऊँ बिठाय

उदल की इतनी सुनी, की मलखान कह उठा ...

राज बघेल की चीज़ क्या कहिये
उसको तोड़ूं बार हजार
जो इतना काम ना करूँ
तो तलवार उठाऊं नाय
इतनी बात कहीं मलखे ने
धांधू सुंत रहा तलवार
क्या तुम सोच रहे निज मन मे
आल्हा मण्डलिक अवतार 
जब तक जिंदा नर धांधू है
बेटा टोडरमल का लाल
तब तक आंख मिलावे तुमसे
किस पाजी का यह मलाल

इतनी बात सुनी लड़को की
घबरा गया चंदेला राय
यह लड़के अब नही मानेंगे
मन मे सोच सोच रह जाय
बुरा होइयो माहिल तेरा
कैसी आग लगाई आय
सोवत सिंह जगाए तूने
शंका करे ये काल की नाय।

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