स्त्री मे रजोधर्म का ज्योतिषीय विश्लेशण - mithila Hindi news

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स्त्री मे रजोधर्म का ज्योतिषीय विश्लेशण

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पंकज झा शास्त्री

मिथिला हिन्दी न्यूज :-वेसे तो स्त्रियों मे रजो धर्म (मासिक चक्र )प्राकृतिक वरदान है रज:प्रवृृत्ति के मूलत्तवों में मंगल पित्त रूप अग्नि और चन्द्र, रक्त रूप जल है। मंगल और चन्द्र का योग रजोदर्शन का कारण है। पित्त के द्वारा रक्त के क्षुभित होने पर नारियों में रजःप्रवृत्ति होती है। आर्तव होने पर नारी गर्भ धारण के योग्य मानी जाती है। किन्तु प्रत्येक आर्तव काल गर्भधारण की क्षमता नहीं रखता है। स्त्री की जन्मकालीन ग्रह-स्थिति से सम्बन्ध रखते हुए आर्तव कालीन चन्द्र अनुपचय भावों में मंगल से द्रष्ट होने पर ही गर्भ के उपयुक्त आर्तव होता है। यह योग बन्ध्या-वृद्धा, रोगी, और अल्पवयस्काओं के लिये नहीं है।

स्त्रीणां गतोऽनुपचयक्र्षमनुष्ण रश्मिः
संदृश्यते यदि धरातनयेन तासाम्
गर्भ ग्रहार्तवमुशन्ति तदा न वन्ध्या
वृद्धा तुराल्यवयसामपि तन्न हीष्टम्।।

दिन के पूर्वान्ह में कन्या का प्रथमार्तव होना शुभ माना है। प्रातःसायं की सन्ध्या में प्रथम ऋतु दर्शन होने से वासना शक्ति प्रबल होती है। तथा रात्रि-काल का आर्तव, कन्या को विधवा बनाता है।

दुर्भगासर्व सन्धिषु

इस वाक्य से अभिप्राय है कि तिथि नक्षत्र, योग या दिन-रात की सन्धियों में रजोदर्शन होना अनिष्ट फल का सूचक है। आर्तव काल के न्यूनाधिक रक्त परिमाण पर आचार्यो की भविष्यवाणी है कि अल्प रक्त स्त्राव होने पर कन्या स्वेच्छाचारिणी होती है। न अधिक और न कम स्त्राव होना शुभ लक्षण माना जाता है, और बहुत स्त्राव होना दुर्भाग्य का सूचक है। आर्तव शोणित के रंग पर भी आचार्यो ने शुभाशुभ फल का निर्देश करते हुए उसके भावी जीवन का शुभाशुभ फलों का निर्देश किया है।

रक्ते रक्ते भवेत् पुत्रः कृष्णोय च मृत पुत्रका
पिच्छलाभे भवेत् बन्ध्या काकवन्धाअ पाण्डुरे।
पीते च स्वैरिणी प्रोक्त सुभगार्गुज बर्णके
सिन्दूरामें भवेत् कन्या रजःशोणित लक्षणम्।।

लाल वर्ण का आर्तव हो तो पुत्रवती के लक्षण पाये जाते हैं। काला रंग होने पर मृत सन्तान होगी। पाण्डुरंग तथा कौवे के पंख जैसा रंग होने पर दाम्पत्य सुख नष्ट होगा। पीला या गुंजा के वर्ण का रंग होना शुभ लक्षण है। सिन्दूर की तरह रंग हो तो कन्या सन्तति अधिक होगी। इस तरह रक्त के रंग पर अपने अनुभव प्रस्तुत करने के पश्चात् ऋतुधर्म के समय धारण किया गये वस्त्रों के रंग पर भी मनोवैज्ञानिक तत्यों से शुभाशुभ फल का संकेत किया है।

सुभागाश्वेत वस्त्रो च रोगिणी रक्त वासना
नीलाम्बरधरा नारी विधवा प्रथमार्तवा।
भोगिनी पीतवस्त्राय दृढ़वस्त्रा च पतिव्रता
दुर्भगा जीर्ण वस्त्राय सुभगा चारूण वासिनी।।
उपरोक्त परिणामों के अतिरिक्त चैत्र, ज्येष्ठ, आषाढ़, कार्तिक, और पौष मास में प्रथम रजोदर्शन होना शुभ नही है। पंचांग शुद्धि के अनुसार रविवार मंगलवार व शनिवार रिक्ता तिथि, गंण्डान्त नक्षत्र, व्यतीपात योग, तथा पापग्रह से पीडित एवं नीच राशिगत चन्द्र में तथा जन्मराशि से 12 वें चन्द्र होने पर प्रथमार्तव होना नेष्ट कहा है।। अधिकांश लक्षणों के नेष्ट होने पर आर्तव शान्ति का विधान है। शान्ति करने से अनिष्ट फलों का ह्नास होकर शुभ फल में वृद्धि होती है।
नोट-किसी भी तरह के त्रुटी होने पर क्षमा चाहता हुँ साथ ही आपका सुझाव भी हमारे लिए महत्वपूर्ण है ।

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