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फ़ुर्सत के पल में जरूर पढें बिहार पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह की कलम से इंसान के जीवन में तलाश

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अनूप नारायण सिंह 

मिथिला हिन्दी न्यूज :-जीवन में वास्तविकता की खोज ही जीवन की तलाश है।हम सभी जीवन के सफ़र में काल्पनिक यात्रावो की रोमांचित उड़ान में विचरण करते हुए बहुत कुछ तलाश करते है।हमारी लेखनी के रूप में विचार आप सभी को दर्पण के रूप में दिखाएगा की कर्म के साथ संतुष्टि ही जीवन को जानने का, जीने का सही मार्ग और तलाश है।इंसान अपने जीवन सफ़र में हमेशा सपनो में खोया सब कुछ पाने की तलाश में रहता है।कभी शान्ति की तलाश,कभी धन की तलाश, कभी सुख की तलाश,कभी आनंद की तलाश, कभी पद की तलाश, कभी शक्ति की तलाश,कभी अमृत की तलाश, कभी प्रेम की तलाश यानी इंसान दुनिया में हर अच्छी वस्तु हो या कुछ महत्वपूर्ण ख़्वाहिश हो तलाश उसके सोच में रहता है।हर व्यक्ति को जीवन में सुख की तलाश है, परंतु असल में सुख क्या है ? यह समझने में उसका पूरा जीवन ही व्यतीत हो जाता है।क्योंकि वह भौतिक सुखों को ही सुख समझता हैं। लेकिन मेरा मानना है कि जो व्यक्ति संतुष्टि के साथ अपने अच्छे विचार चरित्र के साथ रहता है और उसके पास भौतिक सुख कम हो तब भी वह व्यक्ति सुखी है ।जीवन में कई बार व्यक्ति भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए बहुत मेहनत करताहै और कुछ उलटा- पलटा कार्य कर देता है। जिससे वह अपने परिवार, मित्रों, रिश्तेदारों से बहुत दूर हो जाता है और अकेला पड़ जाता है।लेकिन हर व्यक्ति को किसी न किसी के साथ की आवश्यकता होती है जिससे वह अपने दुःख और सुख बाँट सके उसके साथ जीवन संतुष्टि के साथ जी सके। कहते हैं सुख बाँटने से दुगुने हो जाते हैं और दुख बाटने से आधी रह जाते हैं।इसलिए कभी भौतिक सुखों के लिए परिवार और सही मार्ग बताने वाले मित्रों को नहीं छोड़ना चाहिए ।हमने अपने शहर - मोहल्ला में कुछ बुजुर्ग लोगों को देखता हूँ जिन्होंने अपने बच्चों को सुखी जीवन देने की तलाश में विदेश भेज दिया थे ताकि उनके बच्चों का जीवन सुखमय हो सके।अब वे स्वयं यहाँ पर एकांकी जीवन व्यतीत करते हैं।हम देखते है कि उनके साथ न कोई बात करने वाला है और न ही कोई उनको दुख बीमारी में देखने वाला हैं तो क्या ये सुख है?। मेरे विचार में यदि माता पिता के साथ उनके बच्चे और परिवार रहता है चाहे भौतिक सुख कम ही क्यों न हो तो वह परिवार बहुत ही सुखी है, क्योंकि उस परिवार में सब एक दूसरे के साथ दुःख सुख में खड़े रहते है।एक कहानी बताता हु:- सिकंदर उस जल की तलाश में था, जिसे पीने से अमर हो जाते हैं। दुनिया को जितने की तमन्ना थी। वह अमृत की तलाश में काफी दिनों तक देश- दुनिया में भटकने के पश्चात आखिरकार सिकंदर ने वह जगह पा ही ली, जहां उसे अमृत की प्राप्ति होती। वह उस गुफा में प्रवेश कर गया, जहां अमृत का झरना था। वह आनंदित हो गया।जन्म-जन्म की आकांक्षा पूरी होने का क्षण आ गया। उसके सामने ही अमृत जल बह रहा था। वह अंजलि में अमृत को लेकर पीने के लिए झुका ही था कि तभी एक कौआ जो उस गुफा के भीतर बैठा था, जोर से बोला, ठहर, रुक जा, यह भूल मत करना।सिकंदर ने कौवे की तरफ देखा।बड़ी दुर्गति की अवस्था में था वह कौआ। पंख झड़ गए थे, पंजे गिर गए थे, अंधा भी हो गया था, बस कंकाल मात्र था।सिकंदर ने कहा, तू रोकने वाला कौन।कौवे ने जवाब दिया, ‘मेरी कहानी सुन ले। मैं अमृत की तलाश में था और यह गुफा मुझे भी मिल गई थी। मैंने यह अमृत पी लिया। अब मैं मर नहीं सकता, पर मैं अब मरना चाहता हूं। देख मेरी हालत, अंधा हो गया हूं, पंख झड़ गए हैं, उड़ नहीं सकता। पैर गल गए हैं। एक बार मेरी ओर देख ले फिर मर्जी हो तो अमृत पी लेना।देख अब मैं चिल्ला रहा हूं, चीख रहा हूं कि कोई मुझे मार डाले, लेकिन मुझे मारा भी नहीं जा सकता।अब प्रार्थना कर रहा हूं कि परमात्मा से कि प्रभु मुझे मार डालो।एक ही आकांक्षा है कि किसी तरह मर जाऊ। इसलिए सोच ले एक दफा, फिर जो मर्जी हो सो करना। कहते हैं कि सिकंदर सोचता रहा। फिर चुपचाप गुफा से बाहर वापस लौट आया, बगैर अमृत पिए। सिकंदर समझ चुका था कि जीवन का आनंद उस समय तक ही रहता है, जब तक हम उस आनंद को भोगने की स्थिति में होते हैं।
         स्वयं के अंधर तलाश करोगे तो जीवन में सारे सवालों के जवाब मिल जाएंगे।अगर दुसरो में करोगे तो कुछ नये प्रश्न खड़े हो जायेंगे।जीवन यात्रा में जब मनुष्य अपनी ग़लतीयो का वक़ील और दूसरों की गलतियों पर जज बन जाता है तो फैसले नही फासले हो जाते है।सुखी जीवन तलाश में ज़िंदगी के सपने लिए लाखों करोड़ों लोग अपने घर गाँवँ शहर से निकल कर महानगर या विदेशों में जाते हैं।उसमें में से कुछ लोग बेहतर मुक़ाम हासिल करते है तो काफ़ी लोग संघर्ष की ज़िंदगी में सुख, अनंत चाहत की तलाश में भटकते हुवे भीड़ में गुम हो जाते है।मनुष्य में यदि अच्छे संस्कार के साथ संतोष है तो वह सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है। यह मेरा अपना विचार है क्योंकि संतोषी व्यक्ति मृगतृष्णा के पीछे न भागकर कम में ही संतोष कर लेता है। जैसे की मैं इसमें अनुभव कर रहा हूँ की इस कोरोना में किसी व्यक्ति के पास बहुत ही धन संपत्ति क्यों न हो पर जीवन जीने के लिए दाल रोटी ही ज़रूरी है।इसलिए हर इंसान से कहूँगा कि संतोष सुखी जीवन जीने के लिए बहुत ज़रूरी है।एक गाना बहुत कुछ परिभाषित करता है :- ज़िन्दगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए, जब यह सोचा तो घबरा गए आ गए हम कहाँ आ गए, हम थे ऐसे सफ़र पे चले जिसकी कोई मंजिल नहीं, हम ने सारी उम्र जो किया, उसका कोई भी हासिल नहीं, एक ख़ुशी की तलाश में थे कितने गम हमको तड़पा गए जब यह सोचा तो घबरा गए। सुख के विषय में दार्शनिक अरस्तु का कथन है: जिसकी हमें तलाश है, उसे पा लेना ही सुख है जो व्यक्ति के संतुष्टि से जुड़ा है। इस लिए प्रत्येक व्यक्ति का सुख दूसरे से अलग है।भूखे को भोजन से, बेघर को घर से, निर्धन को धन से, अकेले को साथ से तो हर इंसान को आदि-आदि से संतुष्टि प्राप्त होती है। और इसी संतुष्टि में सुख निहित है।इंसान के अंदर श्रृंगार जब संस्कार, चरित्र और शब्दों में हो तो शरीर पर आभूषणों की तलाश नही होनी चाहिए।नम्रता , सहनशीलता, संतुष्टि , संस्कार और मीठे वचन ही मनुष्य के वास्तविक आभूषण होते है।अंत में कहूँगा जिस इंसान को तलाश अच्छी जिंदगी की थी, वे सफ़र में दूर तक निकल पड़े, उनको जिंदगी नही मिली, पर तज़ुर्बे बहुत मिले।और जो इंसान वास्तविकता के साथ जीवन में संतुष्ट है उसे ज़िंदगी में सारी तलाश स्वयं में मिल गई।

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