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कुशोत्पाटन अमावस्या को वर्षभर के लिए रखते हैं कुश, इसके बिना पूजा होती है निष्फल

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पंकज झा शास्त्री 

मिथिला हिन्दी न्यूज :-भाद्रपद मास अमावस्या ,इस अमावस्या को पिठौरी व कुशग्रहणी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हर अमावस्या पर पितर तर्पण किया जाता है और इसका अपना एक विशेष महत्व होता है. भाद्रपद मास आमावस्या को कई लोग इसे कुशी आमावस्या भी कहते है।इस दिन विशेषकर कुश उखारा जाता है जो सालो भर काम आता है। 
भादप्रद की अमावस्या को उखारे कुश को धार्मिक कार्यों ,श्राद्ध आदि करने में कुश का उपयोग किया जाता है।भाद्रपद अमावस्या का महत्व पितृ तर्पण के लिए यह दिन बहुत उत्तम होता है।
धार्मिक दृष्टि से यह तिथि बहुत महत्वपूर्ण होती है. पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिये इस तिथि का विशेष महत्व होता है. क्योंकि इस तिथि को तर्पण, स्नान, दान आदि के लिये बहुत ही पुण्य फलदायी माना जाता है।कोई जातक यदि काल सर्पदोष से पीड़ित है तो उससे मुक्ति के उपाय के लिये भी अमावस्या तिथि काफी कारगर मानी जाती है।
धार्मिक दृष्टि से कुश को बहुत पवित्र समझा जाता है और इसकी चटाई पर राजा लोग भी सोते थे। वैदिक साहित्य में इसका अनेक स्थान पर उल्लेख है। अर्थवेद में इसे क्रोधशामक और अशुभनिवारक बताया गया है। आज भी नित्यनैमित्तिक धार्मिक कृत्यों और श्राद्ध आदि कर्मों में कुश का उपयोग होता है। वैसे जो लोग सोना या तांबा का पवित्री धारण किए रहते है उन्हें कुश की पवीत्रि धारण करने की कोई खास आवश्यक्ता नहीं हैं। परन्तु कुश को निश्चित घर में रखना चाहिए।कूश का तेल निकाला जाता था, ऐसा कौटिल्य के उल्लेख से ज्ञात होता है। भावप्रकाश के मतानुसार कुश त्रिदोषघ्न और शैत्य-गुण-विशिष्ट है। उसकी जड़ से मूत्रकृच्छ, अश्मरी, तृष्णा, वस्ति और प्रदर रोग को लाभ होता है। महाभारत आदिपर्व अध्याय 23 का 24 वां श्लोक। जब किसी भी जातक के जन्म कुंडली या लग्न कुण्डली में राहु महादशा की अति है तो कुश को जल मे डालकर स्नान करने से राहु की नकारात्मक प्रभाव कम हो सकता है।
मिथिला क्षेत्रीय पंचांग अनुसार इसवार कुशी अमावस्या 19अगस्त 2020 को है
अमावस्या तिथि आरंभ18अगस्त को दिन के 9:35के उपरांत,अमावस्या तिथि समापन19अगस्त को 08:11बजे तक।
वैसे अपने अपने क्षेत्र पंचाग अनुसार समय सारणी में अंतर हो सकता है।

पंकज झा शास्त्री
9576281913

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