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दान, दक्षिणा और चंदा में क्या अंतर है ?जानें ज्योतिष के अनुसार

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पंकज झा शास्त्री 

मिथिला हिन्दी न्यूज :- लोग अक्सर दान,दक्षिणा और चंदा तीनों को एक ही समझ लेते है जबकि इस तीनों में काफी अंतर है। आज हम आप सभी के समक्ष दान,दक्षिणा और चंदा इस तीनों में अंतर प्रस्तुत करने का प्रयत्न कर रहे है।

दान- 
दान श्रद्धा से किया जाता है और यह कुछ भी हो सकता है दान किए गए वस्तु पर आप अपना अधिकार नहीं जमा सकते यदि आप किसी भी प्रकार से अपना अधिक जमाने का प्रयत्न भी करते है तो लिए गए दान,दान नहीं होगा।
दान में कुछ प्रमुख दान जीवन दान, गौ दान,कन्या दान और गुप्त दान आदि है।
यदि आप किसी को जीवन दान देते हो तो यह आपकी महानता है परन्तु उसपर आप उस पर अपना रुआव नहीं जमा सकते उसे प्रेम से सलाह दे सकते है।

गौ दान सनातन धर्म में गाय को सर्वोच् स्थान प्राप्त है मां के दूध के बाद गाय का दूध ही मान्य है जो पोस्टिक और सात्विक आहार है। दान किए गए गाय से आप फायदा कमाने या दरवाजे पर रखने का प्रयत्न न करे। जिसको दान किए है उसी को सौंप दे।

कन्या दान जब करते है उस पर आपका अधिकार समाप्त हो जाता है,रिश्ते निभाने हेतु आप उनसे लगाव रख सकते है। कन्यादान होने के बाद विवाह उपरांत ससुराल पक्ष का पूर्ण अधिकार होता है।संतान रिश्ता होने के नाते आप कन्या को सलाह ,विचार दे सकते है समर्थ हो तो अन्य सहयोग भी कर सकते है विवाह उपरांत कन्या के घर में आप किसी भी बात पर जबरदस्ती दखल नहीं दे सकते नहीं तो रिश्तों में कर्वाहट पैदा हो सकती है।

गुप्त दान जिसे महादान भी कहा जाता है। यदि आप दान करते है तो उसमें आपका किसी भी प्रकार से नाम नहीं होना चाहिए।यदि आप दान में अपना नाम किसी भी प्रकार से उजागर करते है तो वह दान नही आप अपना प्रचार कर रहे है।

दक्षिणा- अक्सर लोग यह का देते है कि आजकल पुरोहित जी दक्षिणा अडा कर लेते है। इस पर हम यह जरूर कहेंगे कि दक्षिणा शास्त्र अनुसार निर्धारित है। जिस कारण हेतु पंडित द्वारा कर्मकांड कराया जाता है उस कारण में जो भी खर्च हो उसका दशांश दक्षिणा होता है। कुछ जगह कर्म कांड करने के उद्देश्य का आकलन से उस अनुसार दक्षिणा होता है और यह दक्षिणा भी मांगा जा सकता है। शास्त्रों में कई जगह उस कर्म काण्ड के बदले गुरु द्वारा दक्षिणा मांगने का उल्लेख मिलता है।
दक्षिणा शास्त्र अनुसार तुरंत कर देना चाहिए अन्यथा भूल या अंजान में भी तत्क्षण नहीं किया गया तो वह दक्षिणा दौगुनी हो जाती है और एक रात बीत जाने पर छ गुनी और इसी तरह क्रमशः।
यदि अब पंडित द्वारा दक्षिणा पहले निर्धारित कर लिया जाय तो कहा जाता है पंडित लोभी है और यदि पहले निर्धारित न किया जाय तो दक्षिणा दशांश तो दूर समय स्थिति अनुसार भी दक्षिणा नहीं दिया जाता और कर्म काण्ड करा लेने के बाद न्यूनतम देकर कह दिया जाता है कि पंडित जी आप खुश है न? पंडित जी तो सभी का कल्याण ही चाहता है बेशक पंडित जी रूष्ट मन से ही क्यों न न्यूनतम दक्षिणा लेकर चला जाय। लोगो को यह समझना चाहिए कि पंडित जी भी भौतिक जीवन से दूर नहीं है अतः कम से कम समय अनुसार निश्चित दक्षिणा देना ही चाहिए।
यजमान और पंडित के मन में किसी भी प्रकार से दक्षिणा को लेकर क्षल कपट नहीं होना चाहिए। तभी उस कर्मकांड का सकारात्मक मिलना संभव है।

चंदा- चंदा किसी सार्वजानिक कार्य या धार्मिक हेतु सहयोग के रूप में वसूला जाता है। इसमें व्यक्ति अपने समर्थ और सवेक्षा से सहयोग कर सकते है।
चंदा के रूप में उस कार्य में आने वाली उपयोग में आप चंदा रूप में सहयोग कर सकते है। चंदा जबरदस्ती नहीं वसूला जाता। कई बार कई सार्वजनिक कार्य हेतू चंदा के रूप में वसूली करने हेतु कह दिया जाता है कि आप इतना नहीं इतना दीजिए या आप ये नहीं वो दीजिए। इस तरह से चंदा वसूली करना चंदा नहीं जबरदस्ती रंदारी वसूली किया जाता है।

कई बार धर्म स्थलों पर बैठ कर भी समिति द्वारा स्टोल लगाकर चंदा के नाम पर धन वसूली किया जाता है जो उचित नहीं।धर्म स्थल पर बैठकर चंदा वसूली करना उस धर्म स्थल के गरिमा को गिराने के बराबर है साथ ही इस तरह से वसूली करने से उस धर्म स्थल की शक्ति कमजोर हो है।
कारण सनातन धर्म में माना जाता है कि ईश्वर की शक्ति पूर्ण अनंत है जहां किसी भी प्रकार की कमी नहीं इसी आशा के साथ भक्त ईश्वर के दरबार में अपना प्रार्थना लेकर आते है। ईश्वर के कार्य में सहयोग हेतु दरवार में दान पेटी होता है जिसमें श्रद्धा से दान किया जाता है। अतः धर्म स्थल पर किसी भी समिति द्वारा स्टोल लगाकर धर्म के नाम पर चंदा वसूली करना उचित नहीं। जिसे हम सिर्फ ब्यपरिक दुकान ही कहेंगे।

नोट - आगे हम उपरोक्त विषय पर और भी विस्तृत जानकारी देंगे।

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