वैवाहिक जीवन से पहले खुद को संभाले युवा वर्ग :पंकज झा शास्त्री - mithila Hindi news

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वैवाहिक जीवन से पहले खुद को संभाले युवा वर्ग :पंकज झा शास्त्री

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पंकज झा शास्त्री 


मिथिला हिन्दी न्यूज :-वैवाहिक जीवन का सुख पाना हर गृहस्थ जीवन के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।
शास्त्रों में भी इसकी महत्वपूर्णता को मर्यादित में दर्शाया गया है। विवाह उपरांत काम(रती) संतुष्टि होना अतिआवश्यक है। आज कई युवा इस बहुमूल्य को न समझते हुए विवाह से पहले ही अमर्यादित होकर वीर्य को नष्ट कर रहे है,साथ ही नशीली प्रदार्थ का अधिक सेवन भी वीर्य नष्ट करने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि विवाह उपरांत कई युवा अपने साथी से आंख नहीं मिला पता साथ ही साथी को संतुष्टि की ओर ले जाने में सक्षम नहीं होता। इसका परिणाम यह होता है कि आज लोग बाजार से अंग्रेजी अल्कोहल युक्त दवा का सेवन कर रहे है साथ ही तेल का उपयोग कर रहे है जो और भी घातक है साथ ही प्राकृतिक क्षमता को नष्ट करता है। 
तत्काल तो उपरोक्त अंग्रजी विधि आनंदित करता है लेकिन यह आनंद अधिक समय तक नहीं टिकता। दंपति जीवन में रति संतुष्टि का न होना या वीर्य परिपूर्ण न होने से जीवन नर्क से भी बदतर होने लगता है। ऐसे में कुछ लोग गलत दिशा की ओर भी आगे बढ़ जाते है। हमे लगता है कि इसी स्थिति को देखते हुए कानून ने भी पति पत्नी के बीच वो को मान्यता दिया है। बेशक कानून पति पत्नी और वो को मान्यता दे दिया हो परन्तु यह सभ्य समाज इसे नहीं स्वीकारेगा कारण यह सभ्य समाज पर जोरदार तमाचा है।
 आधुनिक समाज, चिकित्सकों और वैज्ञानिकों में यह विचार गहरी जड़े जमा चुका है कि शुक्र रक्षा या ब्रह्मचर्य का पालन करना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लियें हानिकारक है। वीर्य रक्षा तथा ब्रह्मचर्य अज्ञानता है, धार्मिक अंधविश्वास है और पिछड़ेपन की बात है। आधुनिकता से इस पिछड़े अंधकार युग के विचारों का कोई वास्ता नहीं।
कुछ तथाकथित यौन रोग विशेषज्ञों या सेक्स विशेषज्ञों ने इस विचार का दुरुपयोग अपने व्यापारिक स्वार्थों के लिये करना शुरू कर दिया। उन्होंने शुक्र रक्षा और ब्रह्मचर्य के बारे में झूठी धारणाओं को खूब प्रचारित किया है। वीर्य रक्षा या ब्रह्मचर्य से मानसिक तनाव, अनेक मानसिक रोग होते हैं , कई शारिरिक रोग भी होते ही हैं; यह झूठ सारे संसार में फैला दिया गया। चिकिस्तक और मनोवैज्ञानिक झूठी मान्यताओं के कारण युवाओं को सलाह देते हैं कि कामवासना से पैदा मानासिक व शारीरिक रोगों से बचना है तो वीर्य स्खलन करो। चाहे वेश्यालय में जाओ। यहाँ तक कहा जाता है वेश्याओं से मिलने वाले यौन रोग उन रोगों से कम खतरनाक हैं जो कामवासना को सन्तुष्ट न करने से पैदा होते हैं। करोड़ो युवा इस सलाह को मानकर अपना जीवन अंधकारमय बना रहे हैं।
वासना का व्यापार और बाजार अरबों-खरबों रूपये का है। विश्व स्तर के वासना बाजार के व्यापरियों ने ब्रह्मचर्य तथा वीर्य रक्षा के विचारों को बदनाम करके अपने रास्ते की loveरुकावटों को दूर कर दिया है। सबसे बड़ी कमाल की बात यह है कि उनके झूठ के पक्ष में एक भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। फिर भी वे बड़ी कुशलता व सफलता से असत्य को प्रचारित कर रहे हैं।
एक और कमाल यह है कि मीडिया भी इस झूठ को उजागर नहीं कर रहा, जिसके कारण एक बहुत बड़ा असत्य, सत्य बनकर अनगिनत लोगों के जीवन को खोखला, दुःखी और रोग ग्रस्त बना रहा है। समाज में तेजी से बढ़ रहे व्यभिचार का एक बड़ा कारण यह झूठ भी हैं।
ब्रह्मचर्य और शुक्र रक्षा के प्रभावों पर विश्व स्तर के अनेक शोध चिकित्सा-विज्ञान जगत में हो चुके हैं। हैरानि की बात यह है कि इतना होने पर भी वे शोध मीडिया के माध्यम से कभी सामने नहीं लाए गए। केवल भारत ही नहीं सारे संसार को एक बहुत बड़े असत्य के अंधेरे में बड़ी चालाकी और निर्ममता पूर्वक धकेल दिया गया है।
करोड़ो लोगों, विशेष कर युवाओं का जीवन इस असत्य के कारण अंधकारमय बनचुका और आगे भी बन रहा है। इसीलिये इस विषय को उजागर करना, सत्य को सामने लाने का प्रयास करना आधुनिक युवा की बहुत बड़ी जरूरत है।
एक आश्चर्य की बात यह भी है की विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी सक्षम ऐजेन्सियाँ एड्ज़ के नाम पर, पाठशालाओं में एड्‍ज़ से सुरक्षा के नाम पर कामवासना के प्रचार कों बढ़ावा देने पर अकूत धन खर्च कर रही हैं, पर स्वास्थ्य रक्षा के स्वर्णिम सूत्र ‘ब्रह्मचर्य’ के वैज्ञानिक रूप से बार-बार प्रमाणित ज्ञान को बताने, सिखाने की बात कभी नहीं करतीं। केवल मुठ्ठी भर विचारक और संगठन भारत में इस विचार के (ब्रह्मयर्य व चरित्र रक्षा) के बारे में अपनी आवाज उठा रहे हैं जिन्हे ये काम-वासना का प्रचार करने वाले ‘पिछड़े और पोंगापंथी’ कह कर नकार देते हैं।
इन वैज्ञानिक संगठनो के चारित्र रक्षा विरोधी व्यवहार से स्वाभाविक सन्देह होता है कि वे भी वासना का बाजार फैलाने व चलाने वाली शक्तियों के सहायक बने हुए हैं। भारतीय शासन तंत्र विदेशी शक्तियों द्वारा बार-बार इस्तेमाल होजाने का अनुभव हम अनेकों बार कर ही चुके हैं। मीडिया भी किन्हीं विदेशी शक्तियों की मुठ्ठी में होने के कारण इस सत्य पर पर्दे डाल रहा है, यह अनुमान आसानी से लग जाता है।
कोई मानो या न मानो परंतु हमारा उद्देश्य वास्तविकता से अवगत कराना है। हमे किसी के भावना को ठेस पहुंचाना नहीं चाहते। अतः वैवाहिक जीवन में रति संतुष्टि हेतु होना अति आवश्यक है, जिसके लिए वीर्य रक्षा हेतु स्वयं को संभालना होगा।

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