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प्रसव के बाद आई चमकी तो कविता की सूझबूझ से बची जान

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- प्रसव के बाद चमकी से प्रभावित मनीषा को मिली नई जिंदगी
- सदर अस्पताल और केयर सीएचसी कविता की तत्परता ने बचाई जान 

प्रिंस कुमार 

 असहनीय दर्द सहकर भी मनीषा ने एक बच्चे को जन्म दिया, पर यह क्या ! घर पर प्रसव के बाद उसे चमकी आने लगी । उसका सारा शरीर अकड़ रहा था। मुंह से झाग निकल रहा था| पूरा शरीर बुखार में तप रहा था। यह चमकी के लक्षण थे। इसके बावजूद भी रुलही गांव में अँधेरे कमरे और मामूली पुआल पर लेटी मनीषा को चार -पांच पुरुष भूत- प्रेत का प्रकोप बता उसके बाल खींच रहे थे। तभी उसकी तारणहार बनकर कविता आती है । जिसकी तत्परता से मनीषा और उसके बच्चे को नया जीवन मिल सका। इस संबंध में कविता कहती हैं कि सदर अस्पताल में कार्यरत स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ रश्मि ने कहा कि मनीषा को चमकी आने के मुख्य कारण में 15-16 वर्ष की उम्र में मां बनना था। जिसके कारण उसके शरीर में हीमोग्लोबीन और भी कई मिनरल्स की कमी हो गयी थी। वहीं अन्य कारणों में उसका घर पर ही असुरक्षित प्रसव कराना भी था। 

गृह भ्रमण के दौरान मिली जानकारी 
 कविता कहती हैं कि पिछड़ी और अशिक्षित परिवार में ब्याही मनीषा का विवाह एक वर्ष पूर्व रुलही गांव के मनीष मांझी से हुआ था। पिछले वर्ष के नवंबर में मैं जब रुलही गांव के वार्ड नम्बर 7 में नवजात बच्चे की ट्रैकिंग के लिए पहुंची। वहाँ टीकाकरण स्थल पर आशा दीदी कविता साहा के द्वारा पता चला कि रूलही गांव की चौक न0:-2 वार्ड न0:-6 में मुकेश माझी के घर उनकी पत्नी मनीषा देवी का प्रसव घर पर सुबह चार बजे हुआ है। मैं वहाँ गृह भ्रमण और नवजात बच्चे की ट्रैकिंग के लिए पहुंची तो देखती हूं कि बच्चा तो सुस्त है ही प्रसव के बाद माँ को चमकी आ रही थी। जिसे घर परिवार और आस पड़ोस के लोग भूत का प्रकोप समझकर ओझा को बुलाकर झाड़ फूँक करवा रहे थे। घर परिवार के लोग बहुत परेशान और रो रहे थे। बच्चे की माँ की स्थिति चमकी के कारण बहुत खराब हो चुकी थी| ये सब नजारा देखने के बाद मैं घर के मुखिया बंती माझी को समझायी। चमकी बुखार के बारे में बताया फिर भी वो हॉस्पिटल ले जाने को तैयार नहीं हो रहे थे। मैंने उनसे विनती की और अपने रिस्क पर मनीषा को हॉस्पीटल ले जाने को तैयार किया। एम्बुलेंस के व्यस्त होने के कारण मैंने अपने डीटीओ सुरैया मैम को फोन कर सहायता मांगी, खैर किसी तरह एम्बुलेंस मिल ही गयी। 
आधे घंटे और देर होती तो.......
एम्बुलेंस मिलते ही जल्दी से मैं मनीषा को लेकर सदर अस्पताल गयी। वहां डॉ रश्मि की देख रेख में इलाज हुआ। घर पर असुरक्षित तरीके से प्रसव होने के कारण मनीषा को टांके लगाने पड़े। हीमोग्लोबीन की कमी के साथ अन्य तरह की दिक्कतें भी मनीषा को हो गयी थी। डॉ रश्मि ने कहा था कि अगर आधे घंटा और देर कर देती तो न ही मनीषा होती और न ही उसका बच्चा। अगले दिन मैं वहां गयी मनीषा ने सबसे पहले अपने बच्चे को खोजा जो अब सुरक्षित था। सदर में एक और स्वास्थ्यकर्मी का महत्वपूर्ण योगदान मिला वह भारती दीदी थी| जिन्होंने आने से पहले ही सारी तैयारियां कर रखी थी ताकि मरीज के आते ही तुरंत 
इलाज शुरू हो जाए। मनीषा के अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद मैं, आशा दीदी के साथ लगातार उनका फॉलोअप करती थी। अभी मां और बच्चा दोनों स्वस्थ्य हैं। 
मनीषा प्रकरण से फैली गांव में एईएस के प्रति जागरूकता
मनीषा प्रकरण के बाद से रुलही गांव में चमकी के प्रति जागरूकता आयी है। पिछड़ी और महादलित मुहल्लों में चमकी के लक्षण को पहचाना गया है। आशा कार्यकर्ता के द्वारा भी लगातार चमकी पर लोगों को जानकारी दी जा रही है।

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