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भावनात्मक लगाव से बच्चों के पोषण पर किया काम तो नूतन को मिला नेशनल अवार्ड इनाम

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- सीतामढ़ी जिले के रुन्नीसैदपुर प्रखंड स्थित आंगनबाड़ी केंद्र संख्या 266 की हैं सेविका
- ट्रेनिंग और तकनीक को अपनाकर अपने काम करने के तरीके को बना दिया खास

प्रिंस कुमार 

बच्चों के पोषण पर काम करने वाली इकाइयों में आंगनबाड़ी केंद्रों की कितनी बड़ी भूमिका होती है, इसको जानना समझना हो तो रुन्नीसैदपुर आंगनबाड़ी केंद्र संख्या 266 की माताओं से मिलिए। वे नूतन देवी के जरिये संचालित आंगनबाड़ी केंद्र को अपने बच्चों का पहला घर मानती हैं। ऐसा इसलिए कि एक मां की तरह जिस आत्मीयता से नूतन देवी बच्चे को पोषणयुक्त पहला निवाला खिलाती हैं, वह शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

पोषक क्षेत्र की एक माता मनीषा कुमारी कहती हैं- ’मुझे तो पता भी नहीं था कि मेरी बच्ची माधवी कब छह माह की हो गई। मुझे याद है उस दिन नूतन दीदी सवेरे-सवेरे मेरे घर खीर लेकर आई थीं। उन्होंने आते ही मुझसे पूछा कि जल्दी से यह बताओ कि आज तुम्हारे घर क्या-क्या बना है। मैंने कहा-दाल, चावल और सब्जी। तब उन्होंने बताया कि माधवी आज छह माह की हो गई है, उसे अन्नप्राशन कराना है। नूतन दीदी ने कहा पहले अच्छे से हाथ धो लो, इसके बाद एक कटोरी में दाल-चावल ले आओ। फिर नूतन दीदी खुद एक मां की तरह बच्ची को पहला निवाला खिलाने लगीं। मैं टुकुड़-टुकड़ उनका चेहरा देखती रह गई।’ यह थी एक मां की जुबानी। ऐसे कई उदाहरण हैं, जो नूतन देवी को काम करने के तरीके में खास बनाते हैं। 

बच्चों के पोषण पर काम ने नेशनल अवार्ड तक दिलवाया :

आंगनबाड़ी सेविका नूतन देवी कहती हैं कि मैं भी वही काम करती हूं, जो सभी सेविकाएं करती हैं। बस मैंने अपने काम के तरीके को अपने हिसाब से बदला है। आंगनबाड़ी है बहुत छोटी इकाई, लेकिन सरकार ने इसे बड़ी जिम्मेवारी सौंपी है। सामुदायिक स्वास्थ्य की सबसे पहली और अहम कड़ी यही है। इसलिए जरूरी है कि हर घर से अपने घर जैसा जुड़ाव हो। नूतन ने बताया कि मेरे पोषक क्षेत्र में आज 75 प्रतिशत से अधिक बच्चे ग्रीन जोन यानी स्वस्थ बच्चों की श्रेणी में हैं। यह एक दिन में नहीं हो गया। रेड जोन से ग्रीन जोन में लाने के लिए तीन साल तक दरवाजे-दरवाजे जाकर बच्चों के खानपान पर लोगों को जागरूक करना पड़ा। ट्रीपल ए यानी आंगनबाड़ी सेविका, आशा और एएनएम के संयुक्त प्रयास से हमने बच्चों के पोषण पर क्षेत्र में बेहतर काम किया। 10 अक्टूबर 2018 को दिल्ली में इसके लिए नेशनल अवार्ड मिला। 

तकनीक को बनाया लोगों से जुडाव का माध्यम : 

नूतन देवी ने बताया कि अपना काम बेहतर करने के लिए ट्रेनिंग और तकनीक से जुड़ना ज्यादा जरूरी है। हमने आईएलए मॉडयूल ट्रेनिंग में जो सीखा, उसका अनुसरण किया। कॉम-केयर सॉफटवेयर के जरिये मोबाइल पर वाटिका प्रबंधन, दैनिक पोषाहार और गृह भेद्य के लिए तमाम जरूरी जानकारियां मिल जाती हैं। इसमें गृह भेद्य यानी घर-घर पहुंच के लिए तमाम अपडेट मिलते रहते हैं। आपके पोषक क्षेत्र में किसी बच्चे को कब अन्नप्राशन कराना है, कौन-सी गतिविधियां कब शुरू होनी हैं, इसके बारे में जानकारी मिलती रहती है। हमने अपने काम में इस तकनीक का खूब सहारा लिया है। नूतन बताती हैं कि इस तकनीक से वे तमाम घरों से जुड़ी रहती हैं। लोगों को याद दिलाती हैं आज आपका बच्चा इतनी उम्र का हो गया। आगे अब आपको कैसे उसके खानपान पर ध्यान देना है। केंद्र पर जब अन्नप्राशन कराती हैं तो पोषक क्षेत्र की माताओं को खुद खाना बनाकर बताती हैं कि कौन-सी चीज कितनी मात्रा में बच्चे को दी जाए तो वह कभी कुपोषण का शिकार नहीं होगा। एक एजुकेटर के रूप में मां-दादी की टोली के बीच बच्चों के पोषण के लिए काम करती हैं। घर-घर जाते रहने को सबसे जरूरी मानती हैं। 

मॉडल के तौर पर है केंद्र की पोषण वाटिका :

नूतन देवी कहती हैं कि उनके केंद्र पर पोषण वाटिका को देखने अक्सर लोग आते रहते हैं। उनके अनुसार इस वाटिका में वैसे तो हरी-सब्जियों की खेती के अलावा विशिष्ट तो कुछ नहीं है, लेकिन यह बच्चों के पोषण के लिए जागरूक करने का एक माध्यम जैसा है। खासियत यही है कि हर चीज करीने से है। किस चीज का बच्चे के पोषण के लिए कितना महत्व है, इसको दर्शाया गया है। केंद्र पर जागरूकता संदेशों के पोस्टर और उनके द्वारा बनाई गईं रंगोली इन्हें खास बनाती है। नूतन कहती हैं कि रंगोली बनाने की कला आती है तो इसे भी लोगों को जागरूक करने के मकसद से काम में ले आती हूं। 

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बच्चों के पोषण पर दिया जोर तो चमकी बुखार हुआ कमजोर :

नूतन बताती हैं कि लगातार लोगों को बच्चों के पोषण पर ध्यान देने के प्रति जागरूक करने का ही परिणाम है कि उनके पोषक क्षेत्र में एक भी बच्चा चमकी बुखार की चपेट में नहीं आया है। उन्होंने बताया कि शिवानी नाम की एक आठ साल की बच्ची में चमकी के लक्षण दिखे थे तो उन्होंने तुरंत बच्ची के घर जाकर प्राथमिक उपचार के तौर पर पानी की पट्टी चढाई। बच्ची को ओआरएस का घोल पिलाया और तुरंत पीएचसी भेज दिया। दो से तीन घंटे में बच्ची ठीक होकर घर आ गई। नूतन ने बताया कि लगातार उसका फॉलोअप किया और उसके खानपान के बारे में अभिभावक को बताते रहे। इसी तरह से उनका सतत प्रयास जारी है। पोषक क्षेत्र के हर घर में लोग उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं। नूतन बताती हैं कि लोगों का यह व्यवहार नित नई ऊर्जा से भर देता है।

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