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दुष्टों के निर्दालन के लिए ब्राह्म तथा क्षात्र तेज का उत्तम उपयोग करनेवाले योद्धावतार भगवान परशुराम


श्री. गुरुराज प्रभु



अग्रतश्‍चतुरो वेदा: पृष्ठत: सशरं धनु: ।
 इदं ब्राह्मम् इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ॥
        अर्थ : चारों वेद कंठस्थ कर ब्राह्मतेज से संपन्न तथा क्षात्रतेज के प्रतीक धनुष्य-बाण पीठ पर धारण करनेवाले भगवान परशुराम विरोधियों को शाप से अथवा शस्त्र से परास्त करेंगे ।

    भगवान परशुरामजी के अतुलनीय गुणविशेषताओं का परिचय यह एक श्लोक से ध्यान में आता है I 

     परशुराम श्रीविष्णु के छठे अवतार हैं, इसलिए उन्हें उपास्य देवता मानकर पूजा जाता है । त्रेतायुग के प्रारंभ में महर्षि भृगु के गोत्र में जामदग्नेय कुल में महर्षि जमदग्नी तथा रेणुकामाता के घर श्रीविष्णु ने अपना छठा अवतार लिया । वैशाख शुक्ल तृतीयाकी परशुराम जयंती एक व्रत और उत्सवके तौरपर मनाई जाती है । परशुरामकी कथाएं रामायण, महाभारत एवं कुछ पुराणोंमें पाई जाती हैं । पूर्वके अवतारोंके समान इनके नामका स्वतंत्र पुराण नहीं है । भगवान परशुराम शत्रु के निर्दालन के लिए ब्राह्म तथा क्षात्र इन दोनों तेजों का उत्तम उपयोग करनेवाले श्रेष्ठतम योद्धा के उत्तम उदाहरण हैं ।भगवान परशुराम की गुणविशेषताओं को विशद करनेवाला सनातन संस्था द्वारा संकलित लेख उनके चरणों में सविनय समर्पित ! हम भी साधना कर ब्राह्मतेज धारण करेंगे और धर्मरक्षा कर क्षात्रतेज जगाएंगे I

1. सप्तचिरंजीवों में से एक

अश्‍वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्‍च बिभीषण:।
कृपः परशुरामश्‍च सप्तैते चिरजीविनः ॥

अर्थ : अश्‍वत्थामा, बली, महर्षि व्यास, हनुमान, बिभीषण, कृपाचार्य तथा परशुराम ये सप्त चिरंजीव हैं ।

परशुराम ने काल पर विजय प्राप्त की है । इसलिए वे सप्तचिरंजीवों में से एक हैं । प्रातःकाल उनका स्मरण करने से पुण्य की प्राप्ति होती है ।

2. श्रीविष्णु के छठे अवतार

सत्ययुग में मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह तथा वामन ये श्रीविष्णु के 5 अवतार हुए । त्रेतायुग के प्रारंभ में महर्षि भृगु के गोत्र में जामदग्नेय कुल में महर्षि जमदग्नी तथा रेणुकामाता के घर श्रीविष्णु ने अपना छठा अवतार लिया । उनका नाम परशुराम था । भार्गवगोत्री होने के कारण उन्हें भार्गवराम भी कहा जाता है । 

3. अपराजित योद्धा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के विनाश के लिए परशुराम द्वारा किया गया अद्वितीय पराक्रम !

अ. परशुराम ने तपस्या कर सहस्रार्जुन कार्तवीर्य की अपेक्षा अधिक तपोबल अर्जित करने से सूक्ष्म स्तर पर कार्तवीर्य सहस्रार्जुन की पराजय आरंभ होना
हैहय वंश के अधर्मी राजा महिष्मति नरेश कार्तवीर्य सहस्रार्जुन ने सहस्रों वर्ष कठोर तपस्या कर, भगवान दत्तात्रेयजी को प्रसन्न किया था तथा असीम बलशाली बनकर सहस्रों भुजाएं धारण करने का वरदान प्राप्त किया था । ऐसे कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का नाश करना संभव हो; इसके लिए  उसके तपोबल की अपेक्षा अधिक तपोबल अर्जित करने हेतु परशुराम ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की । कार्तवीर्य के तपोबल को परास्त करने के लिए, परशुराम ने उससे अधिक कठोर तपस्या कर, एक प्रकार से ब्राह्मतेज के शस्त्र से, कार्तवीर्य के पुण्यबल पर ही  प्रहार कर उसे क्षीण कर दिया । इससे कार्तवीर्य की सहस्रों भुजाओं के माध्यम से कार्यरत सूक्ष्म कर्मेंद्रियों की दिव्य शक्ति निष्प्रभ होने लगी तथा अधर्म का प्रतीक बन चुके कार्तवीर्य का सूक्ष्म से पराजित होना प्रारंभ हुआ । कार्तवीर्य को पराजित करने के लिए भगवान परशुराम द्वारा किया गया आध्यात्मिक स्तर का युद्ध अद्वितीय है ।

आ. गोधन की चोरी करनेवालों का विनाश हो, यह संकल्प कर, उसे पूर्ण करना

कार्तवीर्य सहस्रार्जुन ने ऋषि दंपति के विरोध को अनदेखा कर, जमदग्नी आश्रम से कामधेनु को बलपूर्वक अपने साथ ले गया । इस प्रकार उसने गोमाता का अपहरण किया । जब यह घटना हुई, तब परशुराम आश्रम में नहीं थे । वे घनघोर वन में कठोर तपस्या में व्यस्त थे । जब वे जमदग्नी के आश्रम में पहुंचे, तब उनको घटना ज्ञात हुई । कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के नियंत्रण सेे कामधेनु को मुक्त कर, गोमाता तथा गोधन की रक्षा करने हेतु, उन्होंने गोधन की चोरी करनेवालों के विनाश का संकल्प लिया । उनकी शापवाणी सत्य सिद्ध हुई; क्योंकि गोधन चुराने का अपराध करने से कार्तवीर्य का पुण्यक्षय हुआ । जमदग्नी ऋषि पर प्राणघातक आक्रमण करने से कार्तवीर्य के पुत्रों को भी  पाप लगा । परशुराम ने कार्तवीर्य के कुल के विनाश करने का अपना संकल्प पूर्णकर गोमाता को मुक्त किया और आदरपूर्वक उसे पुनः जमदग्नी के आश्रम ले आए ।

4. भगवान परशुराम द्वारा किए गए अपूर्व अवतार-कार्य तथा पराक्रम के प्रमुख उदाहरण

अ. 21 बार पृथ्वी परिक्रमा कर संपूर्ण पृथ्वी को निःक्षत्रिय करना - भगवान परशुराम ने संपूर्ण पृथ्वी की 21 बार परिक्रमा की और पृथ्वी पर उन्मत्त बने अहंकारी तथा अधर्मी क्षत्रियों का नाश किया । इस प्रकार पृथ्वी परिक्रमा कर, उन्होंने पृथ्वी के भार को हलका किया तथा उसके साथ ही पृथ्वी परिक्रमा का पुण्य भी प्राप्त किया ।

आ. सहस्रों क्षत्रिय तथा लाखों की सेना के साथ अकेले युद्ध का सामर्थ्य - प्रजा का उत्पीडन कर संपूर्ण पृथ्वीपर ऊधम मचानेवाले क्षत्रियों की संख्या सहस्रों में थी । उनके पास लाखों अक्षौहिणी सेना का बल था । भगवान परशुराम नरदेह में साक्षात् श्रीमन्ननारायण ही थे । उसके कारण उनमें सहस्रो क्षत्रिय तथा लाखों की सेना के साथ अकेले युद्ध करने का अपूर्व सामर्थ्य था ।

इ. दानवीर - एकछत्र सम्राट की भांति अखिल भूमि के अधिपति होते हुए भी, अश्‍वमेध यज्ञ के समय परशुराम ने यज्ञ के अध्वर्यू महर्षि कश्यप को संपूर्ण पृथ्वी दान की । इससे परशुराम कितने दानवीर थे, यह दिखाई देता है ।

ई. नवसृष्टि का निर्माण करना - भगवान परशुराम ने केवल 3 कदमों में ही समुद्र को पीछे ढकेलकर क्षणार्ध में परशुराम भूमि का निर्माण किया तथा चिता से चित्पावन ब्राह्मणों की उत्पत्ति कर, परशुराम क्षेत्र की नई सृष्टि ही साकार की ।

दुष्टों के निर्दालन के लिए ब्राह्म तथा क्षात्र तेज का उत्तम उपयोग करनेवाले योद्धावतार भगवान परशुराम के चरणों में कोटि कोटि प्रणाम !

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