केशव कुमार ठाकुर
मिथलाचंल में सरकारी कर्मचारी सरकार की मंशा पानी फेर रहे हैं मनमानी पर उतर चुकी है
बिहार सरकार की लाख कोशिश के बाद भी फिर भी मनसा पर पानी फेर रहें । सरकार तो बदलती रहती हैं लेकिन कर्मचारियों के काम करने के तरीक़े में नहीं आया कोई बदलाव।
जिलाधिकारी के आदेश को भी मानने को तैयार नहीं है विकास मित्र। भाजपा और जदयू की ओर से प्रशासन को हिदायत लाख प्रयास के बाद भी रिश्वतखोरी दबंगई में नहीं आयी हैं कोई कमी। मिथलाचंल में भले ही कई बार सत्ता बदली हो सरकार के निजाम बदल गए हो किंतु कर्मचारियों के काम करने का रवैया नहीं बदला।
आलम यह है कि कर्मचारी रैंक के अधिकारियों के आदेशों को भी ठेंगा दिखाने से बाज नहीं आ रहे हैं। जिसका ज्वलंत उदाहरन सुरसंड प्रखंड के मलाही पंचायत के विकास मित्र की है एक मृत्यु प्रमाण पत्र निर्गत करने का लेते हैं *500रुपया* इस विषय पर जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने अपने ही बातों में घिरते हुए नजर आए उन्होंने कहा कि प्रमाण पत्र मेरे पास नहीं था इस लिए दूसरे पंचायत से मोल लिए है इसी लिए पैसा मांग रहा हूँ।
सरकारी दफ्तरों में कर्मचारी अपने हिसाब से काम करने के आदी हो गए हैं। यही कारण है कि छोटे से छोटे काम के लिए आम आदमी को परेशान होना पड़ता है। ऐसे लोगों के कारण ही विभाग की छवि खराब होती है।
मिथलाचंल में सरकारी कर्मचारी सरकार की मंशा पानी फेर रहे हैं मनमानी पर उतर चुकी है
बिहार सरकार की लाख कोशिश के बाद भी फिर भी मनसा पर पानी फेर रहें । सरकार तो बदलती रहती हैं लेकिन कर्मचारियों के काम करने के तरीक़े में नहीं आया कोई बदलाव।
जिलाधिकारी के आदेश को भी मानने को तैयार नहीं है विकास मित्र। भाजपा और जदयू की ओर से प्रशासन को हिदायत लाख प्रयास के बाद भी रिश्वतखोरी दबंगई में नहीं आयी हैं कोई कमी। मिथलाचंल में भले ही कई बार सत्ता बदली हो सरकार के निजाम बदल गए हो किंतु कर्मचारियों के काम करने का रवैया नहीं बदला।
आलम यह है कि कर्मचारी रैंक के अधिकारियों के आदेशों को भी ठेंगा दिखाने से बाज नहीं आ रहे हैं। जिसका ज्वलंत उदाहरन सुरसंड प्रखंड के मलाही पंचायत के विकास मित्र की है एक मृत्यु प्रमाण पत्र निर्गत करने का लेते हैं *500रुपया* इस विषय पर जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने अपने ही बातों में घिरते हुए नजर आए उन्होंने कहा कि प्रमाण पत्र मेरे पास नहीं था इस लिए दूसरे पंचायत से मोल लिए है इसी लिए पैसा मांग रहा हूँ।
सरकारी दफ्तरों में कर्मचारी अपने हिसाब से काम करने के आदी हो गए हैं। यही कारण है कि छोटे से छोटे काम के लिए आम आदमी को परेशान होना पड़ता है। ऐसे लोगों के कारण ही विभाग की छवि खराब होती है।
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