समस्तीपुर, बिहार ( मिथिला हिन्दी न्यूज कार्यालय 31 मार्च,20 ) । नोवेल कोरोना को लेकर बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था कितना एक्टिव है, इसका नज़ारा समस्तीपुर में देखने को मिला। यहाँ लॉकडाउन के दौरान कोरोना की जाँच कराने 185 मरीज पंहुचे सदर अस्पताल, लेकिन ड्यूटी पर डॉक्टर और स्टाफ मौजूद नहीं थे। बता दे कि उत्तरप्रदेश के इटावा से मजदूरों का एक जत्था दो बसों पर सवार होकर समस्तीपुर के कुशेश्वर स्थान जा रहे थे। इस दौरान शहर के मोहनपुर में कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की नज़र इन लोंगो पर पड़ी तो, बस को रुकवा कर पूछ ताछ की गयी तो पता चला की यूपी से बिहार आने के दौरान उनकी कहीं कोई जाँच नहीं हुई है। यह सुनते वे लोग सभी को जाँच कराने के लिए सदर अस्पताल लेकर आये। लेकिन सदर अस्पताल में एक भी डॉक्टर और स्टाफ मौजूद नहीं थे। इससे मरीजों को बहुत परेशानी उठानी पड़ी। वे लोग घंटों लाइन में खड़े रहे, लेकिन न तो कोई डॉक्टर आया और न ही अस्पताल प्रशासन ने इसकी सुध ली, कोरोना के मरीजों की जाँच और इलाज के लिए सदर अस्पताल को कोरोना पेशेंट ट्रीटमेंट सेंटर बनाया गया है। यहां पर अब सिर्फ कोरोना पॉजिटिव मरीज ही भर्ती हो रहे हैं और इनका इलाज हो रहा है, बहरहाल कोरोना वैश्विक महामारी के रूप में सामने आया है और ऐसी स्थिति में डॉक्टरों को मरीजों की नियमित जाँच करनी चाहिए। जिला प्रशासन को चाहिए कि जाँच के कार्य का प्रतिदिन मोनेटरिंग की व्यवस्था हो ताकि इस गंभीर स्थिति में मरीजों को इलाज के लिए सफर ना करना पड़े। इन लोगों में अधिकतर ने मास्क व कुछ ने रूमाल बाध रखे थे। लेकिन, इनमें सुरक्षा का कोई मानक नहीं था। एक-दूसरे से सटकर बैठे लोग कोलकाता से अपने घर पहुंचे हैं। बुद्धिजीवियों के लिए सोचनीय विषय बन गया है । वहीं प्रशासनिक घोषणा कितना सच है इसका नजारा सामने देखने को मिल रहा है । नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की घोषणा भी शायद कागज पर ही है ऐसा ही लगता है तभी तो यूपी सरकार ने भी इन मजदूरों की जांच करना मुनासिब नहीं समझा और बिहार में प्रवेश करने के बाद नाहीं बिहार सरकार जांच कराने की तोहमत उठाई है । इसलिए बिना जांच के ही गरीब मजदूर अपने गंतव्य स्थान तक तो नहीं पहुंच सके । लेकिन सीमा तक जरूर पहुंच गए जहां समाजसेवियों की पहल पर जांच शुरू कराया गया । समस्तीपुर कार्यालय से राजेश कुमार वर्मा द्वारा सम्प्रेषित । Published by Rajesh kumar verma
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