परिवार अदालत ने 27 जनवरी, 2020 को उनकी याचिका खारिज कर दी
जिसके बाद उन्होंने पटना उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी. न्यायमूर्ति पी बी बजंथरी और न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा की खंडपीठ ने यह बोलते हुए निचली अदालत के निर्देश को रद्द कर दिया कि पारिवारिक अदालत ने ‘‘त्रुटिपूर्ण’’ दृष्टिकोण अपनाया कि याचिकाकर्ता का मामला ‘‘अविश्वसनीय’’ हो गया क्योंकि उसने शादी को रद्द करने के लिए ‘‘तुरंत’’ मुकदमा दायर नहीं किया था. खंडपीठ ने बोला, ‘‘याचिकाकर्ता ने स्थिति स्पष्ट कर दी है और कोई अनुचित देरी नहीं हुई है.’’खंडपीठ ने इस महीने की शुरुआत में अपने निर्देश में इस बात पर जोर देने के लिए उच्चतम न्यायालय के निर्णय का भी हवाला दिया कि हिंदू परंपराओं के अनुकूल कोई भी विवाह तब तक वैध नहीं हो सकती जब तक कि ‘‘सप्तपदी’’नहीं की जाती. उच्च न्यायालय ने निर्णय सुनाया, ‘‘विद्वान परिवार अदालत का यह निष्कर्ष कि सप्तपदी का अनुष्ठान नहीं करने का मतलब यह नहीं है कि शादी नहीं किया गया है, किसी भी योग्यता से रहित है.’’
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