वट सावित्री : मिथिला की सांस्कृतिक परंपरा का अनोखा रूप

रोहित कुमार सोनू संपादक 

वट सावित्री व्रत भारत के विभिन्न भागों में मनाया जाता है, लेकिन मिथिला में इसका एक विशिष्ट और सांस्कृतिक रूप देखने को मिलता है। यहां यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नारी शक्ति, पारिवारिक समर्पण और परंपरा का प्रतीक है।

मिथिला में वट सावित्री की विशेषता
मिथिला की महिलाएं वट वृक्ष के नीचे परंपरागत परिधान—लाल साड़ी, सिन्दूर और पूजन की सामग्री के साथ एकत्रित होती हैं। सावित्री और सत्यवान की कथा को सुनते हुए वे पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। मिथिला में इस व्रत के साथ लोकगीतों और पारंपरिक कहावतों की गूंज भी होती है, जो इसे और जीवंत बनाती है।

सांस्कृतिक पहलू
मिथिला की स्त्रियां इस दिन पारंपरिक पकवान बनाती हैं, जैसे—पहिला पूआ, खीर, पूड़ी आदि। कथा के बाद सब एक-दूसरे को 'सावित्री-जैसी सौभाग्यवती बनो' का आशीर्वाद देती हैं। छोटे-छोटे गाँवों में महिलाएं सामूहिक रूप से इस पूजा का आयोजन करती हैं, जिससे सामाजिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर का प्रसार होता है।

आधुनिक संदर्भ में
आज के समय में भी मिथिला की नवविवाहित बेटियाँ इस परंपरा को अपनाकर अपनी जड़ों से जुड़ी रहती हैं। शहरीकरण के बावजूद, वट सावित्री का उत्सव मिथिला की आत्मा में रचा-बसा है।

वट सावित्री मिथिला में नारी शक्ति, श्रद्धा और सांस्कृतिक गर्व का प्रतीक है। यह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और पारिवारिक मूल्यों की अनोखी मिसाल है।

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