संवाद
बिहार के नवादा जिले के वारिसलीगंज प्रखंड के गांवों में दुर्गा पूजा को लेकर अद्भुत परंपराएँ देखने को मिलती हैं। यहाँ ग्रामीणों की अटूट आस्था है कि माता दुर्गा उनकी हर मनोकामना पूरी करती हैं। यही कारण है कि पूजा की जिम्मेदारी हर साल अलग-अलग परिवार निभाते हैं और इसके लिए बाकायदा वर्षों पहले से बुकिंग होती है।
दशकों लंबी प्रतीक्षा
वारिसलीगंज प्रखंड के माफी गांव में स्थिति यह है कि यहाँ दुर्गा पूजा की जिम्मेदारी निभाने के लिए श्रद्धालुओं की बुकिंग सन् 2067 तक हो चुकी है। वहीं रेवार गांव में यह क्रम 2046 तक के लिए तय है। यानी किसी परिवार को मूर्ति स्थापना और पूजा का अवसर पाने के लिए दशकों इंतजार करना पड़ता है।
माफी गांव में इस बार की जिम्मेदारी
इस साल माफी गांव में दुर्गा पूजा की जिम्मेदारी स्वीकृता सिंह को मिली है। उन्हें यह अवसर पूरे 15 साल के इंतजार के बाद प्राप्त हुआ है। उनके पति मधुसूदन सिंह ने जीवनकाल में संकल्प लिया था कि वे दुर्गा पूजा का पूरा खर्च वहन करेंगे, लेकिन उनके निधन के बाद अब स्वीकृता इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।
वे प्रतिमा स्थापना, प्रसाद, पूजा और बाजे का पूरा खर्च स्वयं उठा रही हैं। स्वीकृता कहती हैं कि, “यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे माता की सेवा का अवसर मिला और मैं अपने पति के अधूरे संकल्प को पूरा कर रही हूँ।”
सामाजिक सद्भाव का संदेश
गौरतलब है कि वारिसलीगंज क्षेत्र कभी जातीय तनाव और हिंसाओं की घटनाओं के लिए सुर्खियों में रहा है, लेकिन यहाँ की दुर्गा पूजा की परंपरा लोगों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करती है। पूजा की जिम्मेदारी और बुकिंग की यह व्यवस्था सामाजिक एकता और धार्मिक आस्था का जीवंत उदाहरण है।
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