पटना। नीतीश सरकार के ग्रामीण कार्य मंत्री अशोक चौधरी को असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति के लिए बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC) की ओर से सिफारिश की गई थी, लेकिन अब तक उन्हें जॉइनिंग लेटर जारी नहीं किया गया है। पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय ने पॉलिटिकल साइंस विषय के लिए 18 अभ्यर्थियों की जॉइनिंग सूची जारी की है, जिसमें मंत्री अशोक चौधरी का नाम शामिल नहीं है।
बताया जा रहा है कि अगस्त 2024 में आयोग ने राज्यभर के विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर पदों पर बहाली के लिए अनुशंसा भेजी थी। पॉलिटिकल साइंस विषय में कुल 280 रिक्त पदों के विरुद्ध 274 अभ्यर्थियों का चयन किया गया था। अनुसूचित जाति कोटे से मंत्री अशोक चौधरी का नाम भी इस सिफारिश सूची में शामिल था, लेकिन विश्वविद्यालय की ओर से जारी जॉइनिंग लिस्ट में उनका नाम नहीं डाला गया।
उच्च शिक्षा विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, तीन अभ्यर्थी जॉइनिंग के समय अनुपस्थित रहे, दो अभ्यर्थियों के अनुभव प्रमाणपत्रों की जांच चल रही है, जबकि मंत्री अशोक चौधरी की नियुक्ति उनकी शैक्षणिक योग्यता के सत्यापन के कारण अटकी हुई है।
विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि अशोक चौधरी ने वर्ष 2002 में मगध विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री प्राप्त की थी। अब यह जांच की जा रही है कि यह डिग्री यूजीसी के वर्ष 2009 के नियमों के अनुरूप है या नहीं। सभी शैक्षणिक और अन्य प्रमाणपत्रों की गहन जांच के बाद ही नियुक्ति पत्र जारी किया जाएगा। यदि जांच के दौरान किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है तो नियुक्ति प्रक्रिया रद्द भी की जा सकती है।
गौरतलब है कि बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली को लेकर नियम लंबे समय से विवादों में रहे हैं। वर्ष 2009 में यूजीसी ने पीएचडी और नेट से जुड़े कड़े मानक तय किए थे, जिन्हें 2020 में राजभवन के निर्देश पर कुछ शर्तों के साथ शिथिल किया गया था। इन प्रावधानों के तहत 11 जुलाई 2009 से पहले पीएचडी के लिए पंजीकरण कराने वाले अभ्यर्थियों को राहत दी गई थी। मंत्री अशोक चौधरी की पीएचडी डिग्री भी इसी श्रेणी में बताई जा रही है।
यह मामला पहले भी राजनीतिक बहस का विषय बन चुका है। विपक्ष का आरोप रहा है कि सरकार अपने मंत्रियों और प्रभावशाली लोगों के लिए नियमों में नरमी बरतती है, जबकि आम अभ्यर्थियों को नियुक्ति के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है।
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