डॉ. गोपालजी त्रिवेदी को पद्मश्री से सम्मानित किया जाना बिहार की कृषि परंपरा, वैज्ञानिक दृष्टि और किसान-केंद्रित सोच का राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान है। उन्होंने अपने शोध और कार्यों के जरिए यह साबित किया कि आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक खेती एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं।
डॉ. त्रिवेदी ने लीची के पुराने और कमजोर हो चुके बागानों को पुनर्जीवित करने में अहम भूमिका निभाई। इससे न केवल उत्पादन बढ़ा, बल्कि हजारों किसानों की आय में भी सुधार हुआ। इसके साथ ही उन्होंने जलजमाव वाले इलाकों में मखाना और सिंघाड़े की वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा देकर उत्तर बिहार के किसानों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोले।
शीतकालीन मक्का उत्पादन को बढ़ाने में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। उनके मार्गदर्शन से किसान पारंपरिक फसलों के साथ-साथ वैकल्पिक और लाभकारी खेती की ओर आगे बढ़े। कृषि शिक्षा, अनुसंधान और विस्तार के क्षेत्र में उनका काम आज भी प्रेरणा का स्रोत है।
एक साधारण किसान के बेटे से विश्वविद्यालय के कुलपति बनने तक का उनका सफर संघर्ष, मेहनत और समर्पण की मिसाल है। वे हमेशा मिट्टी, परंपरा और किसानों से जुड़े रहे और अपने ज्ञान का उपयोग किसानों की भलाई के लिए किया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि जड़ों से जुड़े रहकर भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई जा सकती है।
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