किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून केवल शासन का औज़ार नहीं, बल्कि समाज और सरकार के बीच विश्वास का सेतु होता है। यही कारण है कि जब कोई नया कानून या एक्ट सामने आता है, तो उससे जुड़ा पहला और सबसे अहम सवाल यही होता है—क्या इसकी वास्तविक ज़रूरत थी और क्या समाज ने इसकी मांग की थी? हाल के दिनों में इसी प्रश्न को लेकर व्यापक बहस छिड़ी हुई है।
यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि OBC, SC, ST या किसी अन्य सामाजिक वर्ग की ओर से सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी व्यवस्था की मांग सामने नहीं आई थी। न तो कोई बड़ा आंदोलन, न ज्ञापन, न ही संगठित सामाजिक दबाव। ऐसे में अचानक किसी कानून की पहल होना स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में जिज्ञासा और शंका दोनों पैदा करता है। सवाल उठता है कि जब समाज के हितधारकों ने आवश्यकता ही नहीं जताई, तो सरकार ने इसे प्राथमिकता क्यों दी?
कानून का उद्देश्य केवल प्रशासनिक सुविधा तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसका मूल आधार जनहित, सामाजिक सहमति और ज़मीनी सच्चाई होना चाहिए। यदि कोई नियम बिना व्यापक संवाद के लागू किया जाता है, तो वह समाज के भीतर भ्रम और असंतोष को जन्म देता है। लोगों को यह महसूस होने लगता है कि उनके अनुभव, उनकी समस्याएँ और उनकी राय को दरकिनार कर दिया गया है। यही भावना धीरे-धीरे अविश्वास में बदल जाती है, जो लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
इतिहास गवाह है कि जिन कानूनों का निर्माण संवाद और सहभागिता से हुआ, वे अधिक टिकाऊ और स्वीकार्य साबित हुए। इसके विपरीत, बिना चर्चा के लाए गए प्रावधान अक्सर विरोध, संशय और सामाजिक तनाव का कारण बने। बेहतर होता कि सरकार पहले शिक्षाविदों, छात्रों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों से खुला विचार-विमर्श करती। उनकी आशंकाओं, सुझावों और अनुभवों को सुनकर ही कोई ठोस निर्णय लिया जाता।
लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि नीतियाँ ऊपर से थोपी नहीं जातीं, बल्कि नीचे से उठती आवाज़ों को सुनकर गढ़ी जाती हैं। पारदर्शिता और सहभागिता न केवल कानून को मजबूत बनाती हैं, बल्कि सरकार और जनता के बीच भरोसे को भी सुदृढ़ करती हैं। इसलिए आज उठ रहा यह सवाल केवल किसी एक एक्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों और नीति-निर्माण की प्रक्रिया पर भी विचार करने का अवसर देता है।
यह लेख किसी व्यक्ति, वर्ग या समुदाय के विरोध में नहीं, बल्कि स्वस्थ सार्वजनिक विमर्श के उद्देश्य से लिखा गया है। सवाल पूछना लोकतंत्र की आत्मा है, और जवाब ढूँढना सरकार की जिम्मेदारी।
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