दिल्ली में RSS और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की मुलाकात! सियासी हलकों में मच गई हलचल, जानिए इसके सियासी मायने


नई दिल्ली, विशेष संवाददाता।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और चीन की सत्तारूढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के प्रतिनिधियों के बीच दिल्ली में हुई मुलाकात ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। कांग्रेस ने इस बैठक को लेकर केंद्र सरकार और भाजपा पर तीखा हमला बोला है और इसे “कथनी-करनी का विरोधाभास” करार दिया है।

कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने सवाल उठाया कि जो भाजपा वर्षों से चीन को लेकर आक्रामक रुख दिखाती रही है, वही अब बंद दरवाजों के पीछे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से बातचीत कर रही है। उन्होंने इसे “लाल आंख से लाल कालीन तक का सफर” बताया।


🔎 मुलाकात के सियासी मायने क्या हैं?

1️⃣ भाजपा की चीन नीति पर सवाल

भाजपा सरकार सार्वजनिक मंचों पर चीन के खिलाफ सख्त रुख अपनाती रही है—चाहे वह गलवान घाटी का मुद्दा हो या चीनी सामान के बहिष्कार की अपील। ऐसे में RSS और CPC की मुलाकात यह सवाल खड़ा करती है कि क्या सरकार की विदेश नीति और पार्टी-संगठन की रणनीति में अंतर है?

2️⃣ कांग्रेस को मिला हमला बोलने का मौका

कांग्रेस लंबे समय से भाजपा पर “डबल स्टैंडर्ड” का आरोप लगाती रही है। इस मुलाकात ने कांग्रेस को यह कहने का मौका दिया कि भाजपा खुद वही कर रही है, जिसके लिए वह पहले कांग्रेस को घेरती रही है।

3️⃣ चीन-पाकिस्तान एंगल

कांग्रेस ने इस बैठक को राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जोड़ा है। पवन खेड़ा ने सवाल किया कि क्या बातचीत में शक्सगाम क्षेत्र, ऑपरेशन सिंदूर, और पाकिस्तान को चीन की सैन्य मदद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा हुई? इससे यह आशंका गहराती है कि क्या चीन के प्रति भारत का रुख पर्दे के पीछे नरम हो रहा है।

4️⃣ RSS की भूमिका पर बहस

RSS खुद को सांस्कृतिक संगठन बताता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक दल से उसकी मुलाकात यह दर्शाती है कि उसकी भूमिका केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। यह विपक्ष को RSS की राजनीतिक सक्रियता पर सवाल उठाने का आधार देता है।

5️⃣ पारदर्शिता की मांग

कांग्रेस की सबसे बड़ी मांग यह है कि इन बैठकों का एजेंडा, मिनट्स और नतीजे सार्वजनिक किए जाएं। यह मांग आने वाले दिनों में संसद और राजनीतिक विमर्श का बड़ा मुद्दा बन सकती है।



RSS और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की यह मुलाकात केवल एक औपचारिक संवाद नहीं मानी जा रही, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक और कूटनीतिक संकेत निकाले जा रहे हैं। विपक्ष इसे सरकार की चीन नीति में विरोधाभास बता रहा है, जबकि भाजपा की ओर से अब तक कोई विस्तृत और स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमाने के आसार हैं।

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