बिहार विधानसभा/विधान परिषद में जदयू के एमएलसी नीरज कुमार द्वारा उठाए गए सवाल के जवाब में सरकार ने जातिवार आवासीय स्थिति का आंकड़ा पेश किया है। इस डेटा के मुताबिक राज्य में सामान्य वर्ग (सवर्ण) के लोगों में आवासहीनता का प्रतिशत अन्य वर्गों की तुलना में थोड़ा अधिक दर्ज हुआ है।
सरकारी तालिका के अनुसार बिहार में अलग-अलग वर्गों के आवासहीन परिवारों का प्रतिशत इस प्रकार है—
- सामान्य जातियां (सवर्ण): 0.31%
- ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग): 0.30%
- अनुसूचित जनजाति (ST): 0.28%
- अनुसूचित जाति (SC): 0.26%
- अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC): 0.16%
आंकड़े क्या बताते हैं?
इन आंकड़ों से यह साफ होता है कि आवासहीनता केवल किसी एक वर्ग की समस्या नहीं है। अंतर भले ही प्रतिशत में मामूली दिखता हो, लेकिन परिवारों की कुल संख्या को देखें तो यह एक बड़ी सामाजिक चुनौती बन जाती है।
साथ ही यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सवर्ण समुदाय को आम तौर पर समाज में अपेक्षाकृत संपन्न माना जाता है, फिर भी उसके एक हिस्से के पास आज भी पक्का घर नहीं है।
पक्का मकान न होने की हकीकत
तालिका में यह भी दिखता है कि बड़ी संख्या में परिवार खपरैल/टीन की छत या झोपड़ी में रह रहे हैं। यानी सिर्फ “आवासहीन” ही नहीं, बल्कि असुरक्षित और अस्थायी घरों में रहने वालों की संख्या भी काफी है। यह स्थिति बताती है कि आवास योजनाओं की पहुंच और ज़मीनी क्रियान्वयन में अभी सुधार की जरूरत है।
यह डेटा जातीय बहस से ज़्यादा गरीबी और आवास संकट की तस्वीर पेश करता है। सभी वर्गों में ऐसे परिवार मौजूद हैं जिन्हें स्थायी छत की जरूरत है। सरकार की योजनाओं का लाभ जाति से ऊपर उठकर जरूरतमंद तक पहुंचे—यही असली मुद्दा है।
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— संपादक: रोहित कुमार सोनू