संवाद
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। ईरान और इजरायल के बीच टकराव के बाद सबसे ज्यादा फोकस हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर है, जहां से दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल गुजरता है।
भारत अपनी जरूरत का करीब 90% कच्चा तेल आयात करता है। इराक, सऊदी अरब और यूएई जैसे देश इसी समुद्री मार्ग से भारत को तेल भेजते हैं। यदि इस रास्ते में किसी तरह की बाधा आती है तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी लगभग तय मानी जा रही है।
आयात बिल पर बढ़ेगा भारी बोझ
अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से भारत के आयात बिल पर करीब 13-14 अरब डॉलर (लगभग 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक) का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। तेल महंगा होने से रुपया भी दबाव में आ सकता है, जिससे आयातित महंगाई बढ़ेगी।
ट्रांसपोर्ट से लेकर थाली तक असर
डीजल महंगा होने पर ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ेगी। इसका सीधा असर सब्जी, फल, अनाज और अन्य रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर दिख सकता है। रसोई गैस (LPG) की कीमतें भी अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ी हैं, इसलिए घरेलू गैस सिलेंडर महंगा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
कृषि निर्यात पर भी खतरा
भारत के कुल बासमती चावल निर्यात का लगभग 25% हिस्सा ईरान जाता है। अगर भुगतान व्यवस्था या शिपिंग में रुकावट आती है तो किसानों और निर्यातकों के करोड़ों रुपये फंस सकते हैं। इससे कृषि क्षेत्र पर भी दबाव बढ़ सकता है।
सरकार के सामने चुनौती
सरकार सामरिक तेल भंडार, वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत और अन्य जरूरी कदमों पर मंथन कर रही है। हालांकि अल्पकाल में राहत देने के उपाय किए जा सकते हैं, लेकिन अगर तनाव लंबा खिंचता है तो आम आदमी की जेब पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
पश्चिम एशिया के हालात पर पूरी दुनिया की नजर है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयास और वैश्विक बाजार की प्रतिक्रिया तय करेगी कि भारत में महंगाई की मार कितनी गहरी होगी।
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