केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के स्कूलों में दो भारतीय भाषाओं समेत तीन भाषाएं पढ़ाने के नए नियम ने छात्रों और अभिभावकों के बीच कई सवाल खड़े कर दिए हैं। नई व्यवस्था लागू होने के बाद बड़ी संख्या में माता-पिता और विद्यार्थी इसकी प्रक्रिया को लेकर उलझन में दिखाई दे रहे हैं। स्कूलों में भी इस विषय पर पूरी स्पष्टता नहीं होने के कारण भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
जानकारी के अनुसार, नए नियम के तहत छात्रों को तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा, जिसमें दो भारतीय भाषाएं शामिल होंगी। हालांकि, इस बदलाव को लेकर सबसे बड़ी चिंता उन विद्यार्थियों के लिए है जो पहले से एक निश्चित भाषा पैटर्न के अनुसार पढ़ाई कर रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि बीच सत्र या उच्च कक्षाओं में नई भाषा जोड़ना बच्चों के लिए कठिनाई पैदा कर सकता है।
करियर काउंसलर्स के पास भी इस विषय को लेकर बड़ी संख्या में अभिभावक पहुंच रहे हैं और बच्चों की पढ़ाई पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सलाह ले रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भाषा केवल एक विषय नहीं बल्कि विद्यार्थियों के संपूर्ण शैक्षणिक प्रदर्शन से जुड़ी होती है। ऐसे में अचानक बदलाव बच्चों पर अतिरिक्त मानसिक दबाव डाल सकता है।
एक दिलचस्प स्थिति यह भी सामने आ रही है कि कुछ अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला 9वीं कक्षा में किसी दूसरे शिक्षा बोर्ड के स्कूल में करवाने पर विचार कर रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि बच्चा 6वीं से 8वीं तक किसी एक भाषा का अध्ययन करता रहा है, तो 9वीं और 10वीं में भी उसी भाषा की पढ़ाई जारी रहनी चाहिए। अचानक नई भाषा लागू करने से बच्चों को परेशानी हो सकती है।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि CBSE और स्कूल प्रशासन को इस नई व्यवस्था को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए ताकि छात्रों और अभिभावकों की शंकाएं दूर हो सकें। साथ ही स्कूलों को भी समय रहते परामर्श सत्र आयोजित कर विद्यार्थियों को नई नीति के बारे में जानकारी देनी चाहिए।
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