पटना: बिहार की राजनीति में इन दिनों पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। भाजपा और जदयू द्वारा विधान परिषद चुनाव के लिए एनडीए उम्मीदवारों की घोषणा के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर भाजपा ने दीपक प्रकाश को टिकट क्यों नहीं दिया।
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, कोई भी व्यक्ति मंत्री बनने के बाद अधिकतम छह महीने तक बिना किसी सदन का सदस्य रहे पद पर बना रह सकता है। इस अवधि के भीतर उसे विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य होता है। यदि ऐसा नहीं होता, तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है।
दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए जाने के बाद यह माना जा रहा था कि उन्हें विधान परिषद भेजा जाएगा। लेकिन एनडीए द्वारा घोषित सभी 9 उम्मीदवारों की सूची में उनका नाम शामिल नहीं होने से राजनीतिक अटकलें तेज हो गई हैं। अब यदि कोई अप्रत्याशित राजनीतिक बदलाव नहीं होता, तो उनके लिए निर्धारित समयसीमा के भीतर किसी सदन का सदस्य बन पाना कठिन दिखाई दे रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टिकट नहीं मिलने के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं, जिनमें पार्टी का सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन, संगठनात्मक प्राथमिकताएं तथा भविष्य की राजनीतिक रणनीति शामिल हैं। हालांकि भाजपा की ओर से इस विषय पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।
फिलहाल स्थिति यह है कि यदि दीपक प्रकाश निर्धारित समय के भीतर विधानसभा या विधान परिषद की सदस्यता हासिल नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है। हालांकि बिहार की राजनीति में अंतिम समय तक समीकरण बदलते रहे हैं, इसलिए आगे की राजनीतिक गतिविधियों पर सभी की नजर बनी हुई है।
राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा भी है कि भाजपा नेतृत्व दीपक प्रकाश के लिए कोई वैकल्पिक राजनीतिक रास्ता निकालता है या नहीं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।
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