कुछ लोग पूछ रहे हैं कि भरत तिवारी के एनकाउंटर पर इतना विरोध क्यों हो रहा है? आखिर एनकाउंटर तो और भी लोगों के हुए हैं। सवाल उचित है, लेकिन इसका जवाब भरत तिवारी की कहानी में छिपा है।
क्योंकि हर मौत एक जैसी नहीं होती, और हर कहानी सिर्फ एक पुलिस फाइल में दर्ज घटना नहीं होती।
भरत भूषण तिवारी कोई बड़ा नेता नहीं थे, न कोई अधिकारी, न कोई उद्योगपति। वह एक साधारण गांव का असाधारण नौजवान था। उस इलाके का, जहां गंगा की बाढ़ ने लोगों से उनका गांव, उनका घर, उनका बचपन और उनकी पहचान तक छीन ली थी। जब लोग उजड़कर नई जगह बसे, तब उनके सामने सिर्फ जमीन नहीं, बल्कि जीवन को फिर से खड़ा करने की चुनौती थी।
उस बस्ती में अधिकतर गरीब, पिछड़े और दलित परिवार रहते थे। वहां सड़क नहीं थी, बिजली नहीं थी, पानी की व्यवस्था नहीं थी। बरसात में पूरा इलाका जलमग्न हो जाता था। ऐसे समय में भरत तिवारी ने अपने लिए नहीं, उन लोगों के लिए लड़ना शुरू किया जिनकी आवाज कोई सुनना नहीं चाहता था।
वह अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगाता था। ज्ञापन देता था। धरना देता था। सवाल पूछता था। लोगों को उनके अधिकारों के लिए जागरूक करता था। किसी को राशन चाहिए, किसी को चापाकल, किसी को सड़क, किसी को मिट्टी भराई—हर समस्या में लोग भरत को याद करते थे।
कहते हैं कि इंसान की पहचान उसके लिए रोने वालों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके लिए दुआ करने वालों की संख्या से होती है। भरत के अंतिम सफर में उमड़ी भीड़ सिर्फ एक व्यक्ति की विदाई नहीं थी, बल्कि उस भरोसे की विदाई थी जो लोगों ने उसमें देखा था।
लेकिन धीरे-धीरे संघर्ष थकान में बदलने लगा। उम्मीदें टूटने लगीं। व्यवस्था की बंद दीवारें हर दस्तक के बाद और ऊंची लगने लगीं। जो युवा लोगों के लिए लड़ रहा था, वह खुद सिस्टम से लड़ते-लड़ते अकेला पड़ता गया।
कई लोग कहते हैं कि भरत तिवारी भटक गया था। हो सकता है यह सच हो। लेकिन इससे भी बड़ा सच यह है कि कोई भी नौजवान एक दिन अचानक नहीं भटकता। उसके भीतर निराशा, उपेक्षा और असहायता का एक लंबा इतिहास जमा होता है।
और फिर वह दिन आया जब भरत तिवारी की कहानी का अंत गोली की आवाज में लिखा गया।
आज विवाद इस बात का नहीं है कि भरत सही था या गलत। विवाद इस बात का है कि क्या एक लोकतांत्रिक देश में किसी व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया का अवसर मिले बिना मौत के हवाले कर देना स्वीकार किया जा सकता है?
अगर वह अपराधी था तो अदालत सजा देती। अगर निर्दोष था तो अदालत उसे मुक्त करती। लेकिन जब गोली फैसला कर देती है, तब सच और झूठ दोनों अधूरे रह जाते हैं।
भरत तिवारी को चाहने वाले उसे समाजसेवी कहते हैं। विरोधी उसे कानून तोड़ने वाला बताते हैं। लेकिन इन दोनों बहसों से ऊपर एक तस्वीर है—एक युवा की तस्वीर, जिसने अपने गांव और लोगों के लिए सपने देखे थे, और जो उन सपनों को पूरा होते नहीं देख सका।
शायद इसी वजह से लोग भरत तिवारी के लिए आवाज उठा रहे हैं। क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ एक एनकाउंटर नहीं, बल्कि एक ऐसे नौजवान की कहानी है जो व्यवस्था से लड़ते-लड़ते आखिरकार उसी व्यवस्था का शिकार बन गया।
इतिहास यह तय करेगा कि भरत तिवारी कौन था। लेकिन आज उसके गांव की आंखों में जो आंसू हैं, वे सिर्फ एक व्यक्ति की मौत के नहीं, बल्कि एक अधूरे सपने के हैं।
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