बिहार के तीन पारंपरिक उत्पादों को मिला जीआई टैग, नीतीश कुमार ने जताई खुशी


बिहार की समृद्ध कला, शिल्प और सांस्कृतिक विरासत को एक बड़ी पहचान मिली है। राज्य के तीन पारंपरिक उत्पादों—नालंदा बावन बूटी, पत्थरकट्टी शिल्प और पीड़िया पेंटिंग—को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया है। इस उपलब्धि से बिहार के शिल्पकारों, बुनकरों और ग्रामीण उत्पादक समुदाय में खुशी की लहर है।

क्या है जीआई टैग?

भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication-GI) टैग किसी विशेष क्षेत्र में बनने वाले उत्पाद की विशिष्टता और प्रामाणिकता को प्रमाणित करता है। यह टैग मिलने के बाद उस उत्पाद की पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होती है तथा उसकी नकल पर रोक लगाने में मदद मिलती है।

नीतीश कुमार ने दी बधाई

इस अवसर पर नीतीश कुमार ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि बिहार के लिए यह गौरव का क्षण है। उन्होंने कहा कि जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों की विशिष्ट पहचान को नई मजबूती मिलेगी और इनके संरक्षण तथा प्रचार-प्रसार में सहायता मिलेगी।

नीतीश कुमार ने कहा कि यह सम्मान उन कारीगरों और बुनकरों के वर्षों के परिश्रम का परिणाम है, जिन्होंने अपनी पारंपरिक कला और शिल्प को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा है।

नालंदा की बावन बूटी की खासियत

नालंदा की बावन बूटी बुनकरी कला अपनी अनूठी डिजाइन और बारीक कढ़ाई के लिए प्रसिद्ध है। इस कला में वस्त्रों पर 52 प्रकार की पारंपरिक आकृतियों और प्रतीकों का उपयोग किया जाता है। यह बिहार की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

गया का पत्थरकट्टी शिल्प

गया जिले का पत्थरकट्टी गांव अपनी उत्कृष्ट पत्थर नक्काशी कला के लिए देशभर में जाना जाता है। यहां के कारीगर काले पत्थर से देवी-देवताओं की मूर्तियां, सजावटी वस्तुएं और धार्मिक प्रतिमाएं तैयार करते हैं। यह कला सदियों पुरानी परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है।

भोजपुर की पीड़िया पेंटिंग

भोजपुर क्षेत्र की पीड़िया पेंटिंग लोक संस्कृति और ग्रामीण जीवन की झलक प्रस्तुत करती है। यह पारंपरिक चित्रकला विशेष रूप से महिलाओं द्वारा बनाई जाती है और इसमें धार्मिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विषयों को चित्रित किया जाता है।

कारीगरों को मिलेगा लाभ

विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों की बाजार में मांग बढ़ेगी, नकली उत्पादों पर रोक लगेगी और स्थानीय कारीगरों को बेहतर आर्थिक अवसर प्राप्त होंगे। साथ ही बिहार की कला और शिल्प परंपराओं को वैश्विक मंच पर नई पहचान मिलेगी।

यह उपलब्धि न केवल बिहार के लिए गौरव का विषय है, बल्कि राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी मानी जा रही है।

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