एक सवाल जो भरत तिवारी के साथ दफन नहीं होना चाहिए...


कभी-कभी किसी व्यक्ति की मौत सिर्फ एक मौत नहीं होती, वह समाज के सामने कई ऐसे सवाल छोड़ जाती है जिनका जवाब आने वाली पीढ़ियां भी तलाशती रहती हैं। भोजपुर के भरत तिवारी की मौत भी शायद ऐसी ही एक घटना बनती जा रही है।

कहा जा रहा है कि वह हथियार लेकर घूम रहा था, पुलिस पर फायरिंग कर रहा था और जवाबी कार्रवाई में घायल होने के बाद उसकी मौत हो गई। कानून अपना काम करता है और कानून से ऊपर कोई नहीं होता। लेकिन एक इंसान की मौत के बाद कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिन्हें सिर्फ सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों से शांत नहीं किया जा सकता।

दिल को सबसे ज्यादा झकझोरने वाली बात यह है कि जिस युवक को एक दिन "मानसिक रूप से अस्वस्थ" बताया गया, अगले ही दिन वही युवक पुलिस मुठभेड़ का केंद्र बन गया। आखिर इन दो दिनों के बीच ऐसा क्या हुआ?

क्या भरत तिवारी जन्म से अपराधी था?

क्या वह हमेशा से व्यवस्था का विरोधी था?

या फिर उसके भीतर कोई ऐसी पीड़ा, कोई ऐसा संघर्ष, कोई ऐसी बेचैनी थी जिसे समाज और सिस्टम समझ नहीं पाया?

कहा जाता है कि कभी उसे सम्मानित भी किया गया था। किसी मंच पर तालियां मिली थीं। लोगों ने उसकी सराहना की थी। फिर ऐसा क्या हुआ कि वही युवक एक दिन हथियार लेकर खड़ा दिखाई दिया?

हर मौत के पीछे एक कहानी होती है।

किसी मां की उम्मीदें होती हैं।

किसी पिता के सपने होते हैं।

किसी बहन का भरोसा होता है।

किसी दोस्त की यादें होती हैं।

आज भरत तिवारी नहीं है, लेकिन उसके घर के आंगन में जो सन्नाटा पसरा होगा, उसे कोई प्रेस नोट नहीं भर सकता। उसकी मां की आंखों से बहते आंसुओं का जवाब कोई सरकारी बयान नहीं दे सकता। उसके परिवार के मन में उठ रहे सवालों को केवल निष्पक्ष जांच ही शांत कर सकती है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां सवाल पूछना अपराध नहीं है। सवाल पूछना व्यवस्था को मजबूत बनाता है। यदि पुलिस ने पूरी ईमानदारी और मजबूरी में कार्रवाई की है, तो सच सामने आना चाहिए। और यदि कहीं कोई गलती हुई है, तो वह भी सामने आनी चाहिए।

न्याय का अर्थ केवल दोषी को सजा देना नहीं होता, बल्कि सच को सामने लाना भी होता है।

आज भरत तिवारी इस दुनिया में नहीं है। उसकी आवाज हमेशा के लिए खामोश हो चुकी है। लेकिन उसके जाने के बाद जो सवाल हवा में तैर रहे हैं, वे अभी भी जिंदा हैं।

एक मां जानना चाहती है कि उसका बेटा क्यों नहीं लौटा।

एक परिवार जानना चाहता है कि आखिर उस दिन हुआ क्या था।

और समाज जानना चाहता है कि क्या हर संभव कोशिश उसे जीवित बचाने के लिए की गई थी?

शायद इन सवालों का जवाब ही भरत तिवारी की आखिरी विरासत है।

क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में इंसान की जान से बड़ा कोई मुद्दा नहीं होता, और किसी भी मौत से बड़ा कोई सवाल नहीं होता।

आज भरत तिवारी नहीं हैं, लेकिन सच की तलाश अभी बाकी है।

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रिपोर्ट: रोहित कुमार सोनू | Mithila Hindi News

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