बिहार कांग्रेस में 'सृजन साथी' मॉडल पर विवाद, संगठनात्मक पदों के लिए नई व्यवस्था पर उठे सवाल

बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी (BPCC) द्वारा शुरू किए गए 'सृजन साथी जनसंपर्क कार्यक्रम' को लेकर पार्टी के भीतर विवाद गहरा गया है। संगठन को मजबूत करने और जमीनी कार्यकर्ताओं की पहचान के उद्देश्य से शुरू की गई इस पहल पर कई वरिष्ठ नेताओं ने सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि नई व्यवस्था में राजनीतिक योगदान और संगठनात्मक अनुभव की बजाय अधिक संख्या में समर्थकों का पंजीकरण कराने वालों को प्राथमिकता दी जा रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम ने 11 अप्रैल से शुरू हुए इस कार्यक्रम को संगठन में पारदर्शिता लाने और डिजिटल माध्यम से जनसमर्थन का आकलन करने की पहल बताया है। योजना के तहत संगठनात्मक पद के इच्छुक नेताओं को अपने समर्थकों को 'सृजन साथी' के रूप में जोड़ना होगा। प्रत्येक समर्थक का डिजिटल पंजीकरण 50 रुपये शुल्क देकर कराया जाएगा और इसी आधार पर संगठनात्मक पदों के लिए सिफारिश की जाएगी। जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, 3000 सृजन साथी जोड़ने वाले नेता को प्रदेश उपाध्यक्ष, 2000 पर महासचिव, 1000 पर सचिव और 200 सदस्यों पर जिला स्तरीय पद के लिए पात्र माना जाएगा। इसी व्यवस्था को लेकर सबसे अधिक विवाद है। आलोचकों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति 3000 लोगों का पंजीकरण कराता है तो उसे लगभग 1.5 लाख रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या संगठनात्मक पद अब जनाधार और वर्षों की मेहनत के बजाय आर्थिक क्षमता के आधार पर तय होंगे। कटिहार से कांग्रेस सांसद तारिक अनवर ने इस मॉडल का खुलकर विरोध किया है। उनका कहना है कि यह व्यवस्था कांग्रेस की परंपरा, संविधान और संगठनात्मक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि इतनी महत्वपूर्ण योजना लागू करने से पहले वरिष्ठ नेताओं से कोई व्यापक सलाह-मशविरा नहीं किया गया। उनका यह भी कहना है कि केवल अधिक सदस्य जोड़ने के आधार पर किसी व्यक्ति की संगठनात्मक क्षमता का आकलन नहीं किया जा सकता। तारिक अनवर ने 50 रुपये के पंजीकरण शुल्क पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि कांग्रेस की सामान्य सदस्यता शुल्क 10 रुपये है, जबकि 'सृजन साथी' कार्यक्रम के तहत 50 रुपये लिए जा रहे हैं। इस कार्यक्रम में कांग्रेस के सदस्य ही नहीं, बल्कि गैर-सदस्य भी 50 रुपये देकर 'सृजन साथी' बन सकते हैं। वहीं, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम ने सभी आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि यह सदस्यता अभियान नहीं, बल्कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की मंजूरी से शुरू किया गया एक पायलट प्रोजेक्ट है। उनके अनुसार, इस व्यवस्था का उद्देश्य नेताओं को दिल्ली या पटना में लॉबिंग करने के बजाय डिजिटल तरीके से उनके वास्तविक जनसमर्थन के आधार पर आकलन करना है। सूत्रों के अनुसार, इस विवाद की जानकारी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी तक भी पहुंच चुकी है। फिलहाल पार्टी के भीतर इस मॉडल को लेकर चर्चा और असहमति जारी है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इस व्यवस्था में कोई बदलाव करता है या इसे वर्तमान स्वरूप में आगे बढ़ाता है।
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