पूरे देश के लिए दीपावली, लेकिन बिहारियों के लिए छठ महापर्व है सबसे बड़ी भावना, जहां आस्था के आगे छोटी पड़ जाती है दुनिया की हर खुशी

मिथिला हिन्दी न्यूज | रोहित कुमार सोनू

पूरे देश में दीपावली को बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। घर-आंगन दीपों से रोशन होते हैं, बाजारों में रौनक रहती है और हर तरफ खुशियों का माहौल दिखाई देता है। लेकिन जब बात बिहार की आती है तो यहां त्योहारों की खुशियों का एक अलग ही अर्थ है। दीपावली का अपना महत्व है, मगर बिहारियों के दिल में छठ महापर्व के लिए जो जगह है, उसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं है। यहां छठ सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास, संस्कार, परिवार और मिट्टी से जुड़े होने का एहसास है।

छठ का नाम सुनते ही बिहार के गांवों की तस्वीर आंखों के सामने तैरने लगती है। घरों की साफ-सफाई, आंगन में बनते ठेकुआ, चूल्हे पर तैयार होता प्रसाद, बाजारों में सूप और दउरा की खरीदारी, घाटों की सफाई और लोकगीतों की मधुर आवाज मन को भावुक कर देती है। ऐसा लगता है मानो पूरा बिहार एक ही भावना में डूब गया हो।

इस पर्व की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसके लिए लोगों का अपने घर लौटना किसी परंपरा से कम नहीं है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, पंजाब, गुजरात और देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लाखों बिहारी छठ आते ही अपने गांव और शहर की ओर चल पड़ते हैं। किसी को ट्रेन में जगह नहीं मिलती, कोई बसों में सफर करता है तो कोई हजारों किलोमीटर की दूरी सड़क मार्ग से तय करता है। लेकिन चेहरे पर थकान से ज्यादा घर पहुंचने की खुशी दिखाई देती है। क्योंकि छठ पर घर लौटना केवल यात्रा नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से मिलने जैसा है।

छठ महापर्व में दिखने वाली सादगी और पवित्रता इसे विशेष बनाती है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य के माध्यम से श्रद्धालु भगवान सूर्य और छठी मैया की आराधना करते हैं। व्रती कठिन नियमों का पालन करते हुए परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की खुशहाली और सभी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं।

इस पर्व में सबसे भावुक कर देने वाला दृश्य वह होता है, जब डूबते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए पूरा परिवार घाट पर पहुंचता है। किसी के हाथ में सूप होता है, किसी के हाथ में दउरा तो कोई छोटे बच्चों को गोद में लेकर छठी मैया के गीत गुनगुनाता है। घाटों पर जलते दीप, गूंजते लोकगीत और श्रद्धा से जुड़े हजारों हाथ एक अद्भुत दृश्य बनाते हैं।

छठ की एक और खूबसूरती है कि इसमें अमीरी और गरीबी का कोई भेद नहीं होता। हर कोई अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार पूजा करता है। इस पर्व में दिखावा नहीं, बल्कि मन की पवित्रता और विश्वास का महत्व है। यही वजह है कि छठ बिहार की संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक बन चुका है।

बिहारियों के लिए छठ वह अवसर है, जब दूरियां मिट जाती हैं, परिवार एक साथ बैठता है और बचपन की यादें फिर से जीवित हो उठती हैं। जिन घरों में सालभर सन्नाटा रहता है, वहां छठ के दिनों में रौनक लौट आती है। जिन माता-पिता की आंखें अपने बच्चों के इंतजार में लगी रहती हैं, उन्हें अपने परिवार के लौटने से सबसे बड़ी खुशी मिलती है।

दीपावली की रोशनी पूरे देश को जगमगाती है, लेकिन छठ की आस्था बिहार की आत्मा को रोशन करती है। शायद इसलिए कहा जाता है कि बिहारियों के लिए छठ केवल पूजा नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति और अपने परिवार से जुड़ने का सबसे भावुक अवसर है।

क्योंकि हम बिहारियों के लिए छठ सिर्फ मनाया नहीं जाता, छठ को जिया जाता है। इसके गीतों में मां की ममता है, अर्घ्य में परिवार की खुशहाली की प्रार्थना है और घाटों पर उमड़ती भीड़ में अपनी मिट्टी से बेपनाह मोहब्बत है।

जय छठी मैया! 🙏
जय बिहार!

मिथिला हिन्दी न्यूज | संपादक: रोहित कुमार सोनू
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