वैश्विक पहचान के बावजूद मखाना खेती से दूर हो रही नई पीढ़ी, किसानों के सामने नई चुनौती


संवाद 

सरकार के प्रयासों से बिहार के मखाना ने वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना ली है। सरकारी स्तर पर मखाना की वैश्विक ब्रांडिंग के चलते इसकी पहुंच अब 55 से अधिक देशों तक हो चुकी है। बढ़ती अंतरराष्ट्रीय मांग को देखते हुए पिछले वर्ष केंद्र सरकार ने मखाना बोर्ड को भी मंजूरी दी, जिससे इस फसल को संगठित रूप से बढ़ावा मिलने की उम्मीद जगी है।

मखाना की बढ़ती मांग का असर खेती के रकबे पर भी पड़ा है। खासकर मिथिलांचल और सीमांचल के इलाकों में मखाना की खेती का दायरा लगातार बढ़ रहा है। इससे किसानों की आमदनी में भी इजाफा हुआ है और मखाना बिहार की पहचान बनता जा रहा है।

हालांकि, एक बड़ी चिंता यह है कि मखाना की खेती और उत्पादन के प्रति नई पीढ़ी का आकर्षण लगातार कम हो रहा है। युवाओं का रुझान मेहनत भरी पारंपरिक खेती की बजाय अन्य रोजगार और आधुनिक क्षेत्रों की ओर बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मखाना उत्पादन में आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रशिक्षण और युवाओं के लिए प्रोत्साहन योजनाएं नहीं लाई गईं, तो भविष्य में यह सेक्टर श्रम संकट से जूझ सकता है।

अब जरूरत इस बात की है कि सरकार मखाना बोर्ड के जरिए केवल उत्पादन और निर्यात ही नहीं, बल्कि युवाओं को मखाना से जोड़ने के लिए नवाचार, स्टार्टअप और प्रोसेसिंग से जुड़ी योजनाओं पर भी जोर दे।

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