पटना। बिहार में चल रहे विशेष भूमि सर्वे (Bihar Land Survey) को लेकर पटना हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि सर्वे के नाम पर किसी भी व्यक्ति के वर्षों पुराने कब्जे और वैध अधिकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह की एकलपीठ ने खगड़िया जिले से जुड़े मामले में बीरेंद्र कुमार एवं अन्य द्वारा दायर याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि भूमि का स्वामित्व न तो केवल बिक्री विलेख से तय होता है और न ही सिर्फ रिकॉर्ड ऑफ राइट्स (खतियान या रजिस्टर) से। भूमि के स्वामित्व पर अंतिम और निर्णायक फैसला केवल सक्षम दीवानी अदालत ही कर सकती है।
यह मामला खगड़िया जिले के बेलदौर अंचल सहित कई मौजों से संबंधित है। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि उनके पूर्वजों को वर्ष 1946 से पहले जमींदारों द्वारा ‘सरवस्ता’ प्रथा के तहत रैयती भूमि का वैध बंदोबस्त दिया गया था। इसके बाद लंबे समय तक सरकार द्वारा उनसे लगान की वसूली की जाती रही और रजिस्टर-टू में प्रविष्टि भी की गई, जो उनके स्वामित्व और कब्जे का प्रमाण मानी जाती है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि मौजूदा विशेष भूमि सर्वे के दौरान उनसे ऐसे दस्तावेज मांगे जा रहे हैं, जो अब सरकारी अभिलेखागार में भी उपलब्ध नहीं हैं। इससे उनके पुराने अधिकारों और दशकों से चले आ रहे कब्जे पर खतरा उत्पन्न हो गया है।
वहीं राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि याचिका पूर्वकालिक है, क्योंकि सर्वे की प्रक्रिया अभी जारी है। सरकार ने कहा कि बिहार विशेष सर्वे एवं बंदोबस्त अधिनियम, 2011 के तहत आपत्ति दर्ज कराने और समाधान के लिए वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिक्री विलेख भले ही स्वामित्व का अंतिम प्रमाण न हो, लेकिन वैध हस्तांतरण के आधार पर नामांतरण से किसी व्यक्ति को वंचित भी नहीं किया जा सकता। यदि राज्य सरकार को किसी भूमि के स्वामित्व पर आपत्ति है, तो उसका समाधान केवल दीवानी न्यायालय के माध्यम से ही किया जा सकता है, न कि प्रशासनिक सर्वे प्रक्रिया के जरिए।
इस फैसले को भूमि सर्वे के दौरान आम नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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