बिहार में जमीन से जुड़े मामलों, खासकर दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) की प्रक्रिया अब भी आम लोगों के लिए बड़ी परेशानी बनी हुई है। सरकार और राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग द्वारा प्रक्रिया को पारदर्शी और समयबद्ध बनाने के लिए ऑनलाइन सिस्टम लागू किया गया, सख्त समय-सीमा तय की गई और मेगा अभियान भी शुरू किया गया, लेकिन जमीनी हकीकत में अपेक्षित सुधार अब तक नजर नहीं आ रहा है।
विभागीय आंकड़ों के अनुसार राज्यभर में म्यूटेशन के हजारों आवेदन अब भी लंबित हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे मामलों की है जिनकी तय समय-सीमा पहले ही समाप्त हो चुकी है। इससे लोगों को न तो अपनी जमीन का रिकॉर्ड अपडेट मिल पा रहा है और न ही वे अन्य सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा पा रहे हैं।
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने मेगा अभियान के तहत 14 जनवरी तक विशेष शिविर लगाकर पुराने और लंबित मामलों को निपटाने के निर्देश सभी जिलों को दिए हैं। इन शिविरों में अंचल स्तर पर कर्मचारियों और अधिकारियों को तैनात किया गया है ताकि तेजी से दाखिल-खारिज की प्रक्रिया पूरी की जा सके। हालांकि, जमीनी स्तर पर दस्तावेजों की कमी, ऑनलाइन पोर्टल में तकनीकी दिक्कतें और कर्मचारियों की उदासीनता के कारण कई आवेदन खारिज भी किए जा रहे हैं।
आवेदन खारिज होने से आम जनता में नाराजगी बढ़ रही है। लोगों का कहना है कि एक ओर सरकार समय पर म्यूटेशन की बात करती है, वहीं दूसरी ओर छोटी-छोटी तकनीकी या दस्तावेजी कमियों के नाम पर महीनों तक आवेदन लटकाए जाते हैं या खारिज कर दिए जाते हैं।
सरकार का मानना है कि यदि म्यूटेशन समय पर हो तो जमीन से जुड़े विवादों में काफी कमी आएगी और आम लोगों को कोर्ट-कचहरी के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि तय डेडलाइन तक प्रशासन कितनी तेजी से लंबित मामलों का निपटारा कर पाता है और क्या वाकई लोगों को इस समस्या से राहत मिल पाएगी या नहीं।
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