नए साल की दस्तक के साथ ही बिहार की हुकूमत ने ज़मीन से जुड़ी सबसे बड़ी परेशानी पर करारा वार किया है। अब जमीन के काग़ज़ात के लिए न तो रजिस्ट्री दफ्तर के चक्कर लगाने होंगे और न ही स्टांप बाबुओं की दहलीज पर माथा टेकना पड़ेगा। राज्य सरकार ने 1 जनवरी से जमीन से जुड़े सभी दस्तावेजों को ऑनलाइन करने का फैसला लागू कर दिया है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव जय सिंह की ओर से इसका बाकायदा आदेश जारी कर दिया गया है।
अब तक जमीन के कागजात लेना आम लोगों के लिए किसी इम्तिहान से कम नहीं था। स्टांप शुल्क, नकल, अभिप्रमाणित प्रति—हर कदम पर फाइलें सरकती थीं और हफ्तों का वक्त जाया होता था। पुराना सिस्टम पूरी तरह ऑफलाइन था, जिसमें सात से चौदह दिन तक लोगों को इंतजार करना पड़ता था। इसी देरी के बीच दलालों और भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत होती चली गईं।
लेकिन अब सरकार ने डिजिटल सिस्टम के ज़रिये इस पूरी प्रक्रिया को पलट दिया है। नए ऑनलाइन मॉडल के तहत आम लोग भू-अभिलेख पोर्टल से सीधे डिजिटल हस्ताक्षर युक्त दस्तावेज डाउनलोड कर सकेंगे। न स्टांप खरीदने की जरूरत, न ही किसी दफ्तर के चक्कर की मजबूरी। तय शुल्क का ऑनलाइन भुगतान करते ही स्कैन की हुई प्रमाणिक प्रति तुरंत उपलब्ध हो जाएगी।
सरकार का दावा है कि इससे किसानों और आम नागरिकों को सबसे ज्यादा राहत मिलेगी। जमीन की खरीद-बिक्री हो या बैंक से लोन लेने का मामला—दस्तावेज अब फौरन मिल जाएंगे। इससे न केवल समय की बचत होगी, बल्कि पारदर्शिता भी बढ़ेगी और भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगेगी। सत्ता के गलियारों में इसे डिजिटल गवर्नेंस की बड़ी छलांग माना जा रहा है।
विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई दस्तावेज पोर्टल पर उपलब्ध नहीं है, तो आवेदक ऑनलाइन आवेदन कर सकेगा। इसके बाद संबंधित दस्तावेज को स्कैन कर पोर्टल पर अपलोड कर दिया जाएगा। यानी अब फाइलों की धूल और बाबुओं की मेज पर टिके काग़ज़ात धीरे-धीरे इतिहास बनने वाले हैं।
कुल मिलाकर, नए साल में बिहार सरकार ने ज़मीन की व्यवस्था को सिस्टम से निकालकर स्क्रीन पर ला दिया है। यदि यह फैसला ज़मीनी स्तर पर ईमानदारी से लागू हुआ, तो आम जनता को राहत और व्यवस्था को भरोसा—दोनों एक साथ मिलेंगे।
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