भारत रेलवे लोकोमोटिव और कोच निर्माण के क्षेत्र में लगातार नई ऊँचाइयों को छू रहा है। ताज़ा आंकड़ों और विशेषज्ञों के अनुसार, आज भारतीय रेलवे जितनी संख्या में इंजन और कोच का निर्माण कर रहा है, उतना उत्पादन अमेरिका और यूरोप मिलकर भी नहीं कर पा रहे हैं। यह भारत की बढ़ती औद्योगिक क्षमता और आत्मनिर्भर भारत अभियान की बड़ी सफलता मानी जा रही है।
अमेरिका–यूरोप से आगे भारत
रेलवे विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका और यूरोप के सभी लोकोमोटिव निर्माण संयंत्रों के उत्पादन को जोड़ भी दिया जाए, तब भी वह भारतीय रेलवे की कुल मैन्युफैक्चरिंग से कम बैठता है। भारत आज न सिर्फ घरेलू जरूरतों को पूरा कर रहा है, बल्कि बड़ी संख्या में रेलवे इंजन और कोच का निर्यात भी कर रहा है।
दशकों पुराना निर्माण अनुभव बना ताकत
भारत में कोच और लोकोमोटिव निर्माण का इतिहास काफी पुराना रहा है। चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स (CLW), डीजल लोकोमोटिव वर्क्स (DLW), इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF), रेल कोच फैक्ट्री कपूरथला और मॉडर्न कोच फैक्ट्री रायबरेली जैसे प्रतिष्ठानों ने भारतीय रेलवे को तकनीकी रूप से मजबूत बनाया है। अब इन फैक्ट्रियों में आधुनिक तकनीक और हाई-स्पीड प्रोडक्शन के जरिए रिकॉर्ड तोड़े जा रहे हैं।
विदेशों से लगातार मिल रहे ऑर्डर
भारतीय रेलवे को अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और मध्य-पूर्व के कई देशों से कोच और लोकोमोटिव के बड़े ऑर्डर मिल रहे हैं। मेड इन इंडिया रेलवे उत्पादों की गुणवत्ता, कम लागत और भरोसेमंद तकनीक ने भारत को वैश्विक रेलवे बाजार में मजबूत पहचान दिलाई है।
घरेलू मांग और निर्यात दोनों में संतुलन
खास बात यह है कि भारतीय रेलवे एक साथ घरेलू मांग और अंतरराष्ट्रीय निर्यात—दोनों को सफलतापूर्वक पूरा कर रहा है। वंदे भारत ट्रेनों, हाई हॉर्सपावर इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव और आधुनिक एलएचबी कोचों का बड़े पैमाने पर निर्माण इसका स्पष्ट उदाहरण है।
आत्मनिर्भर भारत की मजबूत पटरी
रेलवे लोकोमोटिव और कोच निर्माण में भारत की यह उपलब्धि न सिर्फ आर्थिक मजबूती का संकेत है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि भारत अब तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है।
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