पटना | रोहित कुमार सोनू विशेष रिपोर्ट
बिहार में आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में नई बहस तेज हो गई है। विधानसभा के बजट सत्र के अंतिम दिन बीजेपी विधायक कृष्ण कुमार ऋषि ने मांग उठाई कि पंचायत चुनावों को दलीय आधार पर, यानी राजनीतिक दलों के सिंबल पर कराया जाए। उनका तर्क था कि कई राज्यों में पार्टी सिंबल पर पंचायत चुनाव होते हैं, जिससे चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ती है, उम्मीदवारों की जवाबदेही तय होती है और राजनीतिक संगठन मजबूत होते हैं। विधायक ने यह भी कहा कि चुनाव में अभी लगभग छह महीने का समय है, इसलिए सरकार सभी दलों से बातचीत कर इस बदलाव पर विचार कर सकती है।
हालांकि, पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश ने साफ कर दिया कि फिलहाल बिहार में पंचायत चुनाव बिहार पंचायती राज अधिनियम 2006 के तहत गैर-दलीय आधार पर ही होते हैं और सरकार के पास पार्टी सिंबल पर चुनाव कराने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि सभी राजनीतिक दलों और जनता की व्यापक सहमति बनती है, तो भविष्य में इस दिशा में विचार संभव है।
चुनाव की टाइमलाइन और तैयारियां
वर्तमान स्थिति के अनुसार बिहार की ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद का कार्यकाल दिसंबर 2026 में समाप्त हो रहा है, जबकि चुनाव अक्टूबर–नवंबर 2026 में होने की संभावना है। चुनाव प्रक्रिया की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग, बिहार के पास है, जिसने प्रारंभिक तैयारियां शुरू कर दी हैं। सरकार की ओर से संकेत दिए गए हैं कि इस बार नया आरक्षण रोस्टर और कुछ नई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
पक्ष–विपक्ष की दलीलें
इस प्रस्ताव पर राजनीतिक दलों में साफ मतभेद दिख रहे हैं। समर्थकों का मानना है कि पार्टी आधारित चुनाव से विकास कार्यों में जवाबदेही बढ़ेगी और पंचायत प्रतिनिधि अपने दल की नीतियों के प्रति जिम्मेदार होंगे। वहीं विरोधियों का तर्क है कि इससे ग्रामीण राजनीति का अत्यधिक राजनीतिकरण होगा और पंचायतों का मूल उद्देश्य—स्थानीय विकास व सामुदायिक समाधान—पीछे छूट सकता है।
फिलहाल अंतिम फैसला व्यापक राजनीतिक सहमति और जनमत पर निर्भर है। मगर इतना तय है कि 2026 का पंचायत चुनाव इस बहस के चलते राजनीतिक रूप से बेहद अहम होने वाला है।
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— रोहित कुमार सोनू