पटना से रोहित कुमार सोनू विशेष रिपोर्ट
बिहार की राजनीति में उस वक्त हलचल तेज हो गई जब भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के भाजपा में विलय का प्रस्ताव सामने रखा। इस घटनाक्रम को आगामी राज्यसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है, जिससे इसकी राजनीतिक अहमियत और बढ़ गई है।
राज्यसभा टिकट और कुशवाहा का भविष्य
रालोमो प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा का राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने वाला है और 5 मार्च नामांकन की अंतिम तिथि बताई जा रही है। सियासी सूत्रों के मुताबिक, विलय होने की स्थिति में भाजपा कुशवाहा को दोबारा राज्यसभा भेजने में सहयोग कर सकती है। इसी संभावित डील को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है।
भाजपा का ‘दोहरा फायदा’
विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा इस कदम से एक तीर से दो निशाने साधना चाहती है—
- राज्यसभा में अपनी संख्या मजबूत करना
- पिछड़े वर्गों के सामाजिक आधार को सीधे अपने साथ जोड़ना
कुशवाहा की सियासी पकड़ खासकर कोइरी-कुर्मी सामाजिक समीकरण में प्रभावी मानी जाती है, ऐसे में उनका साथ भाजपा के लिए रणनीतिक बढ़त साबित हो सकता है।
कुशवाहा का रुख क्यों अहम?
हालांकि उपेन्द्र कुशवाहा पहले सार्वजनिक तौर पर भाजपा की सदस्यता लेने से इनकार कर चुके हैं। ऐसे में अब उनका अगला कदम सिर्फ व्यक्तिगत करियर नहीं, बल्कि बिहार की सियासी धुरी को प्रभावित करने वाला फैसला माना जा रहा है। फिलहाल उनकी ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
राज्यसभा चुनाव की समय-सीमा नजदीक होने के साथ ही रालोमो के भाजपा में संभावित विलय की पटकथा तेज़ी से आगे बढ़ती दिख रही है। आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि यह महज़ राजनीतिक शिगूफा है या वाकई बिहार की राजनीति में बड़ा उलटफेर होने वाला है।
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