📚 हर साल बदल रही किताबें, बढ़ रहा खर्च
मामला सिर्फ पटना तक सीमित नहीं है। सीतामढ़ी, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर और मोतिहारी जैसे जिलों में भी अभिभावक इसी तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं।
अभिभावकों का कहना है कि स्कूल हर साल सिलेबस में मामूली बदलाव कर नई किताबें खरीदने के लिए मजबूर करते हैं, जिससे पुराने किताबों का कोई उपयोग नहीं रह जाता।
💰 50-60% तक कमीशन का खेल
रिपोर्ट के अनुसार, किताबों के नाम पर 50 से 60 प्रतिशत तक कमीशन का खेल चल रहा है। स्कूल और चुनिंदा दुकानों के बीच सांठगांठ के कारण अभिभावकों को महंगी किताबें और कवर-फाइल खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि स्कूल यह भी तय करते हैं कि किताबें किस दुकान से ही खरीदनी होंगी।
🏫 “जहां से चाहें खरीदें” दावा फेल
कई स्कूल दावा करते हैं कि अभिभावक कहीं से भी किताबें खरीद सकते हैं, लेकिन हकीकत में उन्हें विशेष दुकानों से ही खरीदारी करनी पड़ती है। दरभंगा और मुजफ्फरपुर के अभिभावकों ने बताया कि अगर बाहर से किताबें ली जाएं, तो स्कूल में मान्यता नहीं दी जाती।
📉 पुराने किताबों का बाजार खत्म
हर साल किताबें बदलने से पुराने किताबों का बाजार लगभग खत्म हो गया है। पहले जहां एक ही किताब कई वर्षों तक उपयोग होती थी, अब हर साल नई किताबें खरीदनी पड़ती हैं। इससे मध्यम वर्गीय और गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ रहा है।
⚖️ प्रशासन की भूमिका पर सवाल
इस पूरे मामले में प्रशासन की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। अभिभावकों का कहना है कि कई बार शिकायत के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती।
समस्तीपुर और सीतामढ़ी में भी इस मुद्दे पर आवाज उठी है, लेकिन अभी तक कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया।
शिक्षा का अधिकार हर बच्चे का मौलिक अधिकार है, लेकिन अगर यही शिक्षा अभिभावकों के लिए आर्थिक बोझ बन जाए, तो यह चिंता का विषय है। जरूरत है कि सरकार और शिक्षा विभाग इस मामले पर सख्त कार्रवाई करें, ताकि स्कूलों की मनमानी पर रोक लग सके और अभिभावकों को राहत मिल सके।
मिथिला हिन्दी न्यूज | रोहित कुमार सोनू