अनूप नारायण सिंह की कलम से
बिहार की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो सिर्फ चुनाव नहीं जीतते, बल्कि लोगों का विश्वास भी जीतते हैं। ऐसा ही एक नाम है — Mithilesh Kumar Tiwari।
गोपालगंज की मिट्टी से निकलकर बिहार सरकार में शिक्षा मंत्री बनने तक का उनका सफर संघर्ष, संगठन, समर्पण और जनविश्वास की मिसाल माना जाता है। बैकुंठपुर की धरती का यह बेटा आज भाजपा के उन भरोसेमंद नेताओं में गिना जाता है, जिन्होंने जमीन से उठकर सत्ता के शीर्ष तक अपनी पहचान बनाई।
साधारण परिवार से असाधारण सफर
साल 1971 में गोपालगंज जिले के बैकुंठपुर प्रखंड के डुमरिया गांव में जन्मे मिथिलेश तिवारी का बचपन अभावों में बीता। परिवार आर्थिक रूप से बहुत समृद्ध नहीं था, लेकिन संस्कार और मेहनत की पूंजी भरपूर थी। उनके पिता देव नारायण तिवारी सरकारी सेवा में थे और बच्चों की शिक्षा को लेकर बेहद गंभीर रहते थे।
परिस्थितियां ऐसी थीं कि पढ़ाई के दौरान मिथिलेश तिवारी ने ट्यूशन पढ़ाकर अपनी शिक्षा पूरी की। संघर्ष उनके जीवन का हिस्सा था, लेकिन उन्होंने कभी हालात को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर
पटना में पढ़ाई के दौरान वे छात्र राजनीति से जुड़े। Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad और Rashtriya Swayamsevak Sangh की विचारधारा ने उनके राजनीतिक जीवन को नई दिशा दी।
उनकी प्रभावशाली भाषण शैली, संगठन क्षमता और कार्यकर्ताओं के बीच मजबूत पकड़ ने उन्हें जल्द ही सक्रिय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया। युवा मोर्चा से लेकर भाजपा संगठन के कई महत्वपूर्ण पदों तक उन्होंने लगातार मेहनत की।
हार से नहीं टूटा हौसला
राजनीति में सफलता उन्हें आसानी से नहीं मिली। 2005 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद भी उन्होंने क्षेत्र नहीं छोड़ा। लगभग एक दशक तक टिकट और राजनीतिक अवसरों का इंतजार किया, लेकिन जनता के बीच उनकी सक्रियता बनी रही।
इसी दौरान बैकुंठपुर में एक नारा बेहद लोकप्रिय हुआ —
"जातिवाद बीमारी है, दवा मिथिलेश तिवारी है।"
यह नारा केवल चुनावी पंक्ति नहीं था, बल्कि क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता और सामाजिक स्वीकार्यता का प्रतीक बन गया।
2015 में बदली राजनीतिक तस्वीर
साल 2015 का विधानसभा चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। उन्होंने मजबूत राजनीतिक समीकरणों के बीच जीत दर्ज की और पहली बार बिहार विधानसभा पहुंचे।
इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। संगठन में उनकी भूमिका लगातार मजबूत होती गई। Narendra Modi की सभाओं के संचालन से लेकर संगठनात्मक रणनीतियों तक, वे पार्टी के भरोसेमंद चेहरों में शामिल होते गए।
क्रिकेट राजनीति में भी सक्रिय भूमिका
मिथिलेश तिवारी सिर्फ विधानसभा की राजनीति तक सीमित नहीं रहे। बिहार क्रिकेट की राजनीति में भी उनकी सक्रियता चर्चा का विषय रही। बिहार क्रिकेट को नई पहचान दिलाने और पुराने विवादों के खिलाफ आवाज उठाने में उनकी भूमिका को लेकर लगातार चर्चा होती रही।
जनता से सीधा जुड़ाव बना ताकत
मिथिलेश तिवारी की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनी, जिनकी भाषा में गांव की मिट्टी की खुशबू महसूस होती है। मंच से भाषण देते समय कार्यकर्ता खुद को उनसे जुड़ा हुआ महसूस करते हैं।
उनका व्यक्तित्व वैचारिक दृढ़ता और सहज व्यवहार का मिश्रण माना जाता है। यही कारण है कि संगठन और जनता दोनों के बीच उनकी मजबूत पकड़ बनी हुई है।
शिक्षा मंत्री बनने के बाद बढ़ी जिम्मेदारी
अब बिहार सरकार में शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी मिलने के बाद उनके राजनीतिक कद में और वृद्धि हुई है। शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभाग की कमान संभालना न सिर्फ उनके अनुभव पर भरोसे का संकेत माना जा रहा है, बल्कि यह भाजपा नेतृत्व की राजनीतिक रणनीति का भी अहम हिस्सा समझा जा रहा है।
बिहार के युवाओं और शिक्षा व्यवस्था को लेकर उनसे अब बड़ी उम्मीदें जुड़ गई हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले मिथिलेश तिवारी को लोग ऐसे नेता के रूप में देखते हैं, जो जमीन की समस्याओं को समझते हैं और संघर्ष की कीमत जानते हैं।
संघर्ष की कहानी से प्रेरणा
गोपालगंज के एक छोटे से गांव से निकलकर बिहार की सत्ता के केंद्र तक पहुंचने की यह कहानी हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है। यह कहानी बताती है कि राजनीति में सिर्फ विरासत नहीं, बल्कि मेहनत, संगठन और जनता का भरोसा भी इतिहास लिख सकता है।
"संघर्ष जिनकी पहचान हो,
जनता जिनकी ताकत हो,
और संगठन जिनका परिवार हो…
वही नेता राजनीति में स्थायी पहचान बनाते हैं।"
पढ़ते रहिए — मिथिला हिन्दी न्यूज