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आज ज्येष्ठ अमावस्या के अवसर पर क्षेत्रभर में वट सावित्री व्रत श्रद्धा, विश्वास और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। सुहागिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर बरगद के वृक्ष की पूजा-अर्चना कर पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सुखमय दांपत्य जीवन की कामना कर रही हैं। गांवों से लेकर नगर क्षेत्रों तक सुबह से ही वट वृक्षों और मंदिरों में पूजा-अर्चना को लेकर भक्तिमय माहौल बना हुआ है।
महिलाएं पारंपरिक परिधान और सोलह श्रृंगार में वट वृक्ष के पास पहुंचकर जल, फूल, अक्षत, फल और सूत अर्पित कर रही हैं। पूजा के दौरान वृक्ष की परिक्रमा कर अखंड सौभाग्य की मंगलकामना की जा रही है। कई स्थानों पर सामूहिक व्रत कथा, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जा रहा है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट सावित्री व्रत माता सावित्री की अटूट निष्ठा, समर्पण और तपस्या का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि माता सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प और पतिव्रता धर्म के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। तभी से यह व्रत पति की दीर्घायु और वैवाहिक सुख के लिए विशेष महत्व रखता है।
पंडित सूर्यमणि पांडेय ने बताया कि सनातन परंपरा में बरगद के वृक्ष को त्रिदेव का स्वरूप माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसकी जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का निवास माना जाता है। इसी कारण वट वृक्ष स्थिरता, दीर्घायु और जीवन ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
इस वर्ष वट सावित्री व्रत के साथ शनि जयंती और शनिश्चरी अमावस्या का विशेष संयोग भी बन रहा है, जिससे इस पर्व का धार्मिक महत्व और बढ़ गया है। श्रद्धालु शनि देव की पूजा कर परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और संकटों से मुक्ति की कामना भी कर रहे हैं।
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