'छाती दबाना रेप की कोशिश नहीं', पटना HC के इस आदेश पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

नई दिल्ली/पटना: यौन अपराध से जुड़े मामलों की सुनवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि न्यायाधीशों को ऐसे मामलों में प्रासंगिक फैसलों और न्यायिक दिशा-निर्देशों का गहन अध्ययन करना चाहिए। यह टिप्पणी उस सुनवाई के दौरान आई, जिसमें पटना हाईकोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट के कुछ फैसलों का उल्लेख किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) की तैयार हैंडबुक और समिति की रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट तथा सभी हाईकोर्ट की वेबसाइटों पर अपलोड करने का निर्देश दिया है। साथ ही राज्यों से कहा है कि पुलिस एफआईआर दर्ज करने और चार्जशीट दाखिल करने के दौरान इन दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करे। यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 मार्च 2025 के एक विवादित आदेश के बाद सुप्रीम कोर्ट में स्वत: संज्ञान के रूप में पहुंचा था। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने पटना हाईकोर्ट के 9 जुलाई 2026 के एक फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किसी महिला की सलवार उतारने का प्रयास और उसकी छाती दबाना हर मामले में दुष्कर्म के प्रयास (Attempt to Rape) का अपराध सिद्ध नहीं करता, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार यह महिला की लज्जा भंग (आईपीसी की धारा 354) का मामला हो सकता है। सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायाधीशों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसे संवेदनशील मामलों में सुप्रीम कोर्ट के प्रासंगिक निर्णयों और दिशा-निर्देशों का अध्ययन करें। उन्होंने टिप्पणी की कि "जजों को भी रिसर्च करनी चाहिए।" पटना हाईकोर्ट का यह फैसला वर्ष 2008 के एक मामले से जुड़ा था। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर माना कि आरोपी द्वारा महिला की मर्यादा भंग करने का अपराध सिद्ध होता है, लेकिन दुष्कर्म के प्रयास का आरोप संदेह से परे साबित नहीं हो सका। इसलिए रेप की कोशिश की सजा को आंशिक रूप से रद्द करते हुए आरोपी को आईपीसी की धारा 354 के तहत दोषी माना गया। – मिथिला हिंदी न्यूज़ रिपोर्ट: रोहित कुमार सोनू
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