नई दिल्ली। आधुनिक समय में घरों और सार्वजनिक स्थानों पर वेस्टर्न यानी इंग्लिश टॉयलेट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। वहीं भारत में पारंपरिक इंडियन या स्क्वाट टॉयलेट का इस्तेमाल लंबे समय से होता आया है। अक्सर यह दावा सोशल मीडिया पर किया जाता है कि इंग्लिश टॉयलेट पर बैठकर शौच करने से शरीर में चर्बी बढ़ती है और फैटी लिवर का खतरा बढ़ जाता है, जबकि इंडियन टॉयलेट से ऐसा नहीं होता। हालांकि वैज्ञानिक शोध इस दावे को सीधे तौर पर सही साबित नहीं करता।
2025 में प्रकाशित एक वैज्ञानिक समीक्षा में स्क्वाटिंग और सिटिंग टॉयलेट से जुड़े 42 अध्ययनों का विश्लेषण किया गया। शोध में पाया गया कि शौच की मुद्रा पाचन प्रक्रिया, मल त्याग में आसानी और मांसपेशियों पर असर डाल सकती है, लेकिन यह प्रमाण नहीं मिला कि वेस्टर्न टॉयलेट का इस्तेमाल करने से सीधे तौर पर शरीर की चर्बी या फैटी लिवर बढ़ता है।
इंडियन टॉयलेट में क्यों हो सकता है फायदा?
इंडियन टॉयलेट में व्यक्ति स्क्वाटिंग यानी उकड़ू मुद्रा में बैठता है। इस स्थिति में कूल्हे और घुटने अधिक मुड़ते हैं तथा मलाशय का कोण अपेक्षाकृत सीधा हो जाता है। इससे मल त्याग के दौरान कम जोर लगाने और आंत को खाली करने में मदद मिल सकती है। वैज्ञानिक समीक्षा में भी स्क्वाटिंग मुद्रा को बेहतर bowel evacuation और कुछ लोगों में कब्ज से राहत से जोड़ा गया है।
इसके विपरीत, वेस्टर्न टॉयलेट में सामान्यतः कूल्हे और घुटने लगभग 90 डिग्री के कोण पर रहते हैं। कुछ लोगों में यह मुद्रा मल त्याग के दौरान अधिक जोर लगाने की जरूरत पैदा कर सकती है। हालांकि इसका असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता।
क्या इंग्लिश टॉयलेट से फैटी लिवर होता है?
नहीं, ऐसा कहने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। फैटी लिवर को केवल टॉयलेट के प्रकार से जोड़ना सही नहीं है। शरीर में अतिरिक्त चर्बी, पेट के आसपास की मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस, डायबिटीज और रक्त में वसा की गड़बड़ी जैसे मेटाबॉलिक कारण फैटी लिवर के महत्वपूर्ण जोखिम कारक हैं।
इसलिए यह कहना कि “इंग्लिश टॉयलेट इस्तेमाल करने से फैटी लिवर हो जाता है” वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।
वेस्टर्न टॉयलेट भी कई लोगों के लिए सुविधाजनक
शोध में यह भी सामने आया है कि स्क्वाटिंग हर व्यक्ति के लिए बेहतर नहीं होती। बुजुर्गों, घुटने या कूल्हे की समस्या वाले लोगों और कुछ शारीरिक स्थितियों से जूझ रहे लोगों के लिए बैठकर इस्तेमाल किया जाने वाला टॉयलेट अधिक सुरक्षित और आरामदायक हो सकता है। 2025 की समीक्षा में भी दोनों तरह की मुद्राओं के फायदे और नुकसान बताए गए हैं तथा शोधकर्ताओं ने अधिक मजबूत और लंबे समय के अध्ययनों की आवश्यकता बताई है।
वेस्टर्न टॉयलेट इस्तेमाल करने वाले क्या करें?
यदि किसी व्यक्ति को कब्ज या मल त्याग में परेशानी होती है, तो वेस्टर्न टॉयलेट पर पैरों के नीचे छोटा फुटस्टूल रखकर घुटनों को कूल्हों से थोड़ा ऊपर किया जा सकता है। इससे स्क्वाटिंग जैसी मुद्रा के कुछ फायदे मिल सकते हैं और मल त्याग आसान हो सकता है।
इसके साथ पर्याप्त पानी पीना, फाइबर युक्त भोजन लेना, नियमित शारीरिक गतिविधि करना और लंबे समय तक टॉयलेट पर बैठकर मोबाइल चलाने से बचना भी महत्वपूर्ण है।
इंडियन टॉयलेट की स्क्वाटिंग मुद्रा मल त्याग के लिए कुछ लोगों में अधिक अनुकूल हो सकती है, लेकिन इंग्लिश टॉयलेट को सीधे मोटापा या फैटी लिवर का कारण बताना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। स्वास्थ्य पर असर डालने वाले वास्तविक कारणों पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है।