कभी-कभी अदालत का एक फैसला किसी इंसान की पूरी जिंदगी बदल देता है। लेकिन जब किसी व्यक्ति को वर्षों बाद अदालत से यह सुनने को मिले कि उसके खिलाफ दोषसिद्धि टिकने लायक नहीं थी, तब सवाल सिर्फ इतना नहीं रह जाता कि उसे कितने साल जेल में रहना पड़ा। सवाल यह होता है कि जो समय उससे छिन गया, उसे कौन लौटाएगा? जो माता-पिता उसकी राह देखते-देखते दुनिया से चले गए, उन्हें कौन वापस लाएगा? जो भाई उसके साथ जीवन का संघर्ष साझा करते थे, वे कहां से लौटेंगे? और जिस घर-परिवार की जमीन उसके जेल में रहते बिक गई, उसे कौन वापस करेगा? उत्तर प्रदेश के ललितपुर के विष्णु तिवारी की कहानी इसी असहनीय सवाल के सामने खड़ा कर देती है।
विष्णु तिवारी जब वर्ष 2000 में जेल गए थे, तब उनकी उम्र महज करीब 23 वर्ष थी। वह उम्र जब एक युवा अपने भविष्य के सपने देखता है, परिवार के लिए कुछ करने की सोचता है और अपनी जिंदगी की दिशा तय करता है। लेकिन एक आपराधिक मुकदमे ने उनकी जिंदगी को ऐसी दिशा में धकेल दिया, जहां अगले करीब दो दशक जेल की दीवारों के बीच गुजर गए। वर्ष 2021 में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद उनकी रिहाई का रास्ता खुला, तब वह 40 वर्ष से अधिक उम्र के हो चुके थे। यानी उनकी जवानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सलाखों के पीछे बीत चुका था।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस लंबे इंतजार के दौरान उनके माता-पिता और दोनों भाइयों की मृत्यु हो गई। परिवार की जमीन भी बिक चुकी थी। जिस परिवार से एक युवा जेल जाते समय जुड़ा हुआ था, रिहाई के समय वह परिवार लगभग बिखर चुका था। कल्पना कीजिए, जिस व्यक्ति को जेल भेजे जाते समय उम्मीद रही होगी कि एक दिन वह वापस अपने घर लौटेगा और अपने लोगों के बीच नई जिंदगी शुरू करेगा, जब वह सचमुच बाहर आया तो उसके अपने ही लोग उसके साथ नहीं थे।
यह सिर्फ जेल से बाहर आने की कहानी नहीं थी। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी थी जिसे बाहर आकर अपनी जिंदगी फिर से शुरू करनी थी, लेकिन जिंदगी का वह हिस्सा ही उसके पास नहीं बचा था जिसे वह फिर से जी सकता।
इस मामले में अभियोजन की कहानी के अनुसार घटना 16 सितंबर 2000 की बताई गई थी। आरोप था कि विष्णु तिवारी ने खेत की ओर जा रही एक महिला के साथ बलात्कार किया, जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया और शिकायत करने पर धमकी दी। घटना के तीन दिन बाद, 19 सितंबर को मामला दर्ज हुआ। विष्णु तिवारी ने आरोपों से इनकार किया और खुद को निर्दोष बताया। बचाव पक्ष की ओर से यह तर्क भी रखा गया कि दोनों पक्षों के बीच जमीन को लेकर विवाद था और इसी विवाद के कारण उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया।
लेकिन मुकदमे की प्रक्रिया आगे बढ़ी और 24 फरवरी 2003 को ललितपुर के सेशन जज ने विष्णु तिवारी को IPC की धारा 376 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल की सश्रम कैद और जुर्माने की सजा दी। इसके अलावा SC/ST Act की धाराओं 3(2)(v) और 3(1)(xii) के तहत उम्रकैद और जुर्माने की सजा सुनाई गई। अदालत ने सजाओं को साथ-साथ चलाने का आदेश दिया।
विष्णु तिवारी के लिए यह फैसला उनकी जिंदगी पर लगा ऐसा ताला था, जिसकी चाबी उन्हें लगभग दो दशक बाद मिली।
उन्होंने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक उनकी अपील लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ सकी और लगभग 16 वर्षों तक वह मामला ‘Defective Matter’ के रूप में लंबित रहा। इस दौरान विष्णु जेल में ही रहे। एक इंसान अदालत से न्याय की उम्मीद लगाए बैठा था, लेकिन न्याय की प्रक्रिया ही उसके लिए इंतजार का दूसरा नाम बन गई।
फिर वह दिन आया जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड और साक्ष्यों को विस्तार से देखना शुरू किया। 28 जनवरी 2021 को जस्टिस डॉ. कौशल जयेंद्र ठाकेर और जस्टिस गौतम चौधरी की पीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया और विष्णु तिवारी को बरी कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में उनकी आवश्यकता नहीं है तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
हाईकोर्ट के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल सिर्फ आरोप नहीं थे, बल्कि यह था कि क्या उपलब्ध साक्ष्य उन आरोपों के आधार पर दोषसिद्धि को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त थे।
अदालत ने FIR दर्ज होने में हुई तीन दिन की देरी को रिकॉर्ड पर मौजूद महत्वपूर्ण परिस्थिति के रूप में देखा। गवाहों के बयानों में क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान सामने आई विसंगतियों और विरोधाभासों पर भी अदालत ने ध्यान दिया। मेडिकल साक्ष्य की भी जांच की गई। अदालत के सामने मौजूद मेडिकल रिकॉर्ड में जबरन यौन संबंध के स्पष्ट संकेत नहीं पाए गए थे और डॉक्टर ने बलात्कार के संबंध में कोई निश्चित राय नहीं दी थी। हाईकोर्ट ने मौखिक और मेडिकल साक्ष्यों को समग्र रूप से देखते हुए दोषसिद्धि को बनाए रखने योग्य नहीं माना।
SC/ST Act की धारा 3(2)(v) को लेकर भी मामला महत्वपूर्ण था। उस समय लागू कानूनी प्रावधान के संदर्भ में सिर्फ यह तथ्य पर्याप्त नहीं था कि पीड़ित व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है। यह भी साबित करना आवश्यक था कि अपराध उस व्यक्ति के SC/ST समुदाय से संबंधित होने के कारण किया गया था। बचाव पक्ष ने इसी कानूनी कसौटी का सहारा लिया और सुप्रीम कोर्ट के संबंधित फैसलों का हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने SC/ST Act की धारा 3(2)(v) के तहत दोषसिद्धि करते समय इस आवश्यक पहलू को पर्याप्त रूप से साबित मान लिया था। हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद परिस्थितियों के आधार पर ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि को कायम नहीं रखा।
यहीं से यह मामला एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सवाल खड़ा करता है। किसी संरक्षणकारी कानून का उद्देश्य कमजोर और वंचित वर्गों को अपराध और भेदभाव से सुरक्षा देना हो सकता है, लेकिन किसी भी कानून के तहत आरोप लगना और अदालत में दोष सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। इसी तरह किसी कानून के संभावित दुरुपयोग की चर्चा और उस कानून की आवश्यकता—ये भी दो अलग प्रश्न हैं। विष्णु तिवारी का मामला इसी अंतर को समझने की जरूरत सामने रखता है।
किसी व्यक्ति को गलत तरीके से दोषी ठहराए जाने की कीमत केवल जेल की चारदीवारी के भीतर बिताए गए वर्षों से नहीं मापी जा सकती। उसकी कीमत उन जन्मदिनों से भी होती है जो परिवार के बिना बीते। उन त्योहारों से होती है जिनमें घर सूना रहा। उस मां की आंखों से होती है जो अपने बेटे के लौटने का इंतजार करती रही। उस पिता की उम्मीदों से होती है जो शायद आखिरी समय तक अपने बेटे को बाहर देखना चाहता रहा। उन भाइयों की जिंदगी से होती है जो उसके साथ बड़े हुए लेकिन उसकी रिहाई से पहले ही दुनिया छोड़ गए।
और फिर उस व्यक्ति से पूछिए जो 20 साल बाद जेल से बाहर आता है—क्या सिर्फ जेल का दरवाजा खुल जाने से उसकी जिंदगी वापस आ गई?
जवाब शायद इतना आसान नहीं होगा।
विष्णु तिवारी के लिए रिहाई किसी उत्सव की तरह नहीं रही होगी। वह एक ऐसा क्षण रहा होगा जिसमें आजादी की खुशी और बीते हुए जीवन का दर्द एक साथ खड़ा था। बाहर दुनिया बदल चुकी थी। जिन लोगों के बीच वह लौटना चाहता था, उनमें से कई नहीं रहे थे। परिवार की परिस्थितियां बदल चुकी थीं। जमीन बिक चुकी थी। और सबसे बड़ी बात—जिस उम्र में जीवन बनना था, वह उम्र लौटकर नहीं आने वाली थी।
इस मामले की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि अदालत तक पहुंचने और दोषसिद्धि पलटने में करीब दो दशक लग गए। अगर किसी व्यक्ति को अंततः बरी कर दिया जाता है, तो वह फैसला कानूनी राहत तो दे सकता है, लेकिन बीते हुए वर्षों को वापस नहीं ला सकता।
विष्णु तिवारी की कहानी इसलिए केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह आपराधिक न्याय व्यवस्था के सामने खड़े उस कठिन सवाल की कहानी है कि न्याय सिर्फ सही फैसला देने का नाम है या सही समय पर फैसला देने का भी?
कानून की नजर में किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सबसे मूल्यवान अधिकारों में से एक है। इसलिए जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छिनती है तो हर स्तर पर निष्पक्ष जांच, विश्वसनीय साक्ष्य, उचित कानूनी प्रक्रिया और समय पर सुनवाई का महत्व बढ़ जाता है। किसी भी मामले में आरोप गंभीर हो सकते हैं, कानून कड़े हो सकते हैं और समाज न्याय की उम्मीद कर सकता है, लेकिन अंतिम कसौटी अदालत में उपलब्ध प्रमाण और कानून की निर्धारित कसौटी ही होती है।
विष्णु तिवारी को 2003 में मिली सजा और 2021 में हाईकोर्ट से मिली राहत के बीच लगभग 18 वर्ष का अंतर था। उनके लिए यह सिर्फ कैलेंडर के पन्नों का बदलना नहीं था। यह जिंदगी के उन वर्षों का गुजर जाना था जिन्हें कोई अदालत, कोई सरकार और कोई मुआवजा पूरी तरह वापस नहीं कर सकता।
उनकी कहानी का सबसे मार्मिक पक्ष शायद यही है कि जब वह जेल गए थे, तब उनके पास परिवार था और भविष्य था। जब वह बाहर आए, तो उनके पास आजादी तो थी, लेकिन अतीत का वह संसार नहीं था जिसमें वह लौटना चाहते थे।
इसलिए विष्णु तिवारी की कहानी को सिर्फ यह कहकर खत्म करना आसान होगा कि SC/ST Act ने उनकी जवानी के 20 साल छीन लिए। लेकिन पूरा सच इससे कहीं ज्यादा गहरा है। संरक्षणकारी कानूनों की जरूरत और उनके संभावित दुरुपयोग की जांच—दोनों को अलग-अलग समझना जरूरी है। किसी मामले में आरोप लगना दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं होता और किसी व्यक्ति के बरी होने के बाद भी उसके साथ बीते वर्षों की भरपाई अपने आप नहीं हो जाती।
विष्णु तिवारी के मामले में अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड, गवाहों के विरोधाभास, मेडिकल साक्ष्य, FIR में देरी और SC/ST Act की लागू कानूनी कसौटी जैसे पहलुओं को देखते हुए दोषसिद्धि को पलट दिया। लेकिन इस फैसले के साथ एक ऐसा सवाल भी हमेशा खड़ा रहेगा जिसका जवाब किसी फैसले की आखिरी पंक्ति में नहीं मिलता—अगर न्याय आने में इतना समय लग जाए कि इंसान की जवानी, परिवार और जीवन का एक बड़ा हिस्सा बीत जाए, तो उस खोए हुए समय का हिसाब कौन देगा?
जेल का दरवाजा 2021 में खुल गया था, लेकिन विष्णु तिवारी के जीवन से 20 साल का जो अध्याय मिट गया, वह कभी दोबारा लिखा नहीं जा सकता।
यही इस कहानी का सबसे दर्दनाक सच है—किसी निर्दोष व्यक्ति की आजादी वापस दी जा सकती है, लेकिन उसकी बीती हुई जिंदगी वापस नहीं दी जा सकती।
मिथिला हिन्दी न्यूज | रोहित कुमार सोनू
संपादक: रोहित कुमार सोनू