जितिया व्रत की सबसे प्रसिद्ध कथा महादानी और धर्मात्मा राजा जीमूतवाहन से जुड़ी हुई है। यह कथा त्याग, करुणा और मानवता का अद्भुत संदेश देती है।
कहा जाता है कि जीमूतवाहन ने युवावस्था में ही राजसुख त्यागकर अपने माता-पिता की सेवा का मार्ग चुना था। एक दिन वन में भ्रमण के दौरान उनकी मुलाकात एक नागमाता से हुई जो अपने पुत्र के लिए विलाप कर रही थीं।
नागमाता ने बताया कि गरुड़ के भय से नागवंश ने समझौता किया है कि प्रतिदिन एक नाग गरुड़ के भोजन के लिए भेजा जाएगा। उस दिन उनके पुत्र की बारी थी। यह सुनकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो गया।
उन्होंने नागमाता को आश्वासन दिया कि उनके पुत्र को कुछ नहीं होगा। इसके बाद वे स्वयं नागपुत्र के स्थान पर कपड़े में लिपटकर उस शिला पर लेट गए जहां गरुड़ भोजन लेने आते थे।
गरुड़ उन्हें अपने पंजों में दबाकर उड़ गए, लेकिन रास्ते में उन्हें कुछ अजीब लगा। जब उन्होंने कपड़ा हटाया तो पाया कि यह कोई नाग नहीं बल्कि एक मनुष्य है। जीमूतवाहन ने पूरी घटना सुनाई।
उनकी दया, साहस और त्याग से प्रभावित होकर गरुड़ ने उन्हें छोड़ दिया और भविष्य में नागों को न खाने की प्रतिज्ञा भी की।
यही कारण है कि जितिया व्रत में जीमूतवाहन की पूजा की जाती है और उन्हें संतान रक्षा का प्रतीक माना जाता है। यह कथा आज भी लाखों महिलाओं को त्याग और करुणा की प्रेरणा देती है।
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