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मोहनपुर के एक दर्जन से अधिक गांव गंगा में समाए, दशकों बाद भी पुनर्वास का इंतजार
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سبتمبر 13, 2026
मिथिला हिन्दी न्यूज | रोहित कुमार सोनू
मोहनपुर प्रखंड के एक दर्जन से अधिक गांव अब सिर्फ नाम बनकर रह गये हैं। कभी घनी आबादी वाले इन गांवों को गंगा नदी ने इस कदर अपने में समा लिया कि बित्ते भर जमीन भी नहीं बची। चारों ओर पानी और बालू नजर आता है। बाढ़ और कटाव की लगातार मार झेल रहे इन गांवों के हजारों परिवार दशकों बाद भी विस्थापन का दर्द झेलने को मजबूर हैं।
धरनी पट्टी पश्चिमी पंचायत के बरुआ, जहींगरा, मकनपुर, सरसावा, धरनी पट्टी पूर्वी पंचायत के पचासा और हरिदासपुर, बघड़ा पंचायत के बरियारपुर, कुतुबपुर तथा डुमरी दक्षिणी पंचायत के शाह आलमपुर समेत कई गांव गंगा के कटाव से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। धीरे-धीरे इन गांवों की आबादी उत्तरवर्ती क्षेत्रों की ओर बढ़ती गयी और वहां नये इलाकों में लोगों ने अपना आशियाना बसाया।
इन गांवों के अधिकांश लोग पहले खेती-बाड़ी पर ही निर्भर थे। जमीन गंगा में समा जाने के बाद लोगों को जीविका के नये साधन तलाशने पड़े, लेकिन अपनी जमीन और खेती से उनका लगाव आज भी बना हुआ है। गर्मी के मौसम में गंगा का जलस्तर कम होने पर नदी कुछ जमीन छोड़कर सिमटती है। उस दौरान बालू वाली जमीन पर विभिन्न फसलों की खेती की जाती है। किसान कड़ी मेहनत कर किसी तरह फसल तैयार करते हैं, लेकिन इससे होने वाली आमदनी इतनी ही होती है कि परिवार का जीवन किसी तरह चल सके।
बरसात आते ही यही जमीन फिर गंगा के पानी में डूब जाती है। इस बार की बाढ़ में भी गंगा नदी ने इन इलाकों को पूरी तरह अपनी चपेट में ले लिया। जिन लोगों ने उत्तर की ओर नये घर बनाकर अपना जीवन दोबारा शुरू करने की कोशिश की थी, वहां तक भी बाढ़ का पानी पहुंच गया। फिलहाल कई घरों से पानी निकल रहा है, लेकिन जमीन पर लंबे समय तक जलजमाव बने रहने की आशंका है। इसका सीधा असर कृषि भूमि और आने वाले फसल चक्र पर पड़ सकता है।
बाढ़ और कटाव की त्रासदी झेल रहे हजारों परिवारों के लिए सबसे बड़ी समस्या स्थायी पुनर्वास की है। दशकों गुजर जाने के बावजूद इन परिवारों के पुनर्वास की ठोस व्यवस्था नहीं हो सकी है। कई परिवारों को अब तक केवल आश्वासन ही मिला है। हर साल बाढ़ आने के साथ ही इन परिवारों के सामने विस्थापन का पुराना दर्द फिर खड़ा हो जाता है।
जिन लोगों का जीवन कभी अपनी जमीन और खेती के इर्द-गिर्द चलता था, वे आज लगातार बदलती परिस्थितियों के बीच जीवन-यापन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जमीन छिन जाने के बाद भी उनका अपनी मिट्टी से जुड़ाव खत्म नहीं हुआ है। बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी इन परिवारों की परेशानी समाप्त नहीं होती, क्योंकि लंबे समय तक रहने वाला जलजमाव, खेती को होने वाला नुकसान और अगली बाढ़ की आशंका उनकी चिंता बढ़ाती रहती है।
मोहनपुर के इन परिवारों की पीड़ा सिर्फ बाढ़ के पानी तक सीमित नहीं है। इनके लिए असली सवाल सुरक्षित जमीन, स्थायी पुनर्वास और भविष्य की सुरक्षा का है। वर्षों से पुनर्वास की उम्मीद लगाए बैठे परिवार अब सरकार से किसी ठोस पहल की आस लगाए हुए हैं। गंगा की धारा ने भले ही इनके गांवों का अस्तित्व मिटा दिया हो, लेकिन इन परिवारों की अपनी जमीन और स्थायी ठिकाने की तलाश आज भी जारी है।
मिथिला हिन्दी न्यूज | संपादक: रोहित कुमार सोनू
