सीतामढ़ी। मिथिलांचल का प्रसिद्ध लोकपर्व चौरचन (चौठ चंद्र) आज, 14 सितंबर 2026 को पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। मिथिला की लोक परंपरा और संस्कृति से गहराई से जुड़े इस पर्व को लेकर घर-घर में विशेष तैयारियां की गई हैं। महिलाएं दिनभर व्रत रखकर शाम के समय भगवान गणेश और चंद्रमा की पूजा-अर्चना करेंगी।
चौरचन पर्व में शाम के समय चंद्रोदय के बाद खुले आकाश के नीचे विशेष पूजा की जाती है। इस दौरान अईपन (अरिपन) बनाया जाता है और विभिन्न प्रकार के पारंपरिक पकवान, फल, दही आदि से चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। पूजा के दौरान भगवान गणेश की भी विधिवत पूजा की जाती है। इस पर्व को मिथिलांचल का 'मिनी छठ' भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें भी श्रद्धा और पारंपरिक विधि से खुले आकाश के नीचे चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार चौरचन के दिन चंद्रमा की पूजा करने से मिथ्या कलंक से मुक्ति मिलती है। मान्यता है कि इस पर्व पर विधि-विधान से पूजा करने और चंद्रमा को अर्घ्य देने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और सौभाग्य बना रहता है। यही कारण है कि मिथिलांचल के लोगों के लिए यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है।
आज शाम चंद्रोदय के बाद पूजा का शुभ समय बताया गया है। उपलब्ध पंचांग संबंधी जानकारी के अनुसार लगभग शाम 5:54 बजे से रात 7:36 बजे के आसपास पूजा का शुभ मुहूर्त रहेगा। हालांकि स्थानीय चंद्रोदय और पंचांग के अनुसार समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।
चौरचन के अवसर पर घरों में पारंपरिक पकवान बनाए गए हैं। पूजा की थाली को सजाकर महिलाएं परिवार के सदस्यों के साथ चंद्रमा के दर्शन और पूजन की तैयारी करेंगी। मिथिलांचल के गांवों से लेकर शहरों तक इस पर्व को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है।
चौरचन केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मिथिला की समृद्ध लोक संस्कृति, परंपरा और पारिवारिक एकता का प्रतीक भी है। नई पीढ़ी तक इस परंपरा को पहुंचाने में भी इस पर्व की महत्वपूर्ण भूमिका है। पर्व के अवसर पर लोग एक-दूसरे को चौरचन और चौठ चंद्र की शुभकामनाएं दे रहे हैं।