👁️ अब तक पढ़ा गया:
बार
बिहार में 16 साल पुराने रिश्वतखोरी मामले में बड़ा फैसला, मधेपुरा के पूर्व जिला सहकारिता पदाधिकारी डॉ. पारस नाथ प्रसाद दोषी करार
0
October 30, 2026
मिथिला हिन्दी न्यूज | रोहित कुमार सोनू
बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की कार्रवाई में एक और बड़ी सफलता मिली है। भागलपुर की विशेष निगरानी अदालत ने मधेपुरा के तत्कालीन जिला सहकारिता पदाधिकारी डॉ. पारस नाथ प्रसाद को रिश्वत लेने के मामले में दोषी करार दिया है। करीब 16 साल पुराने इस मामले में उन्हें 35 हजार रुपये रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया गया था। अदालत से दोषी करार दिए जाने के बाद उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया है। अब सजा के बिंदु पर 31 अक्टूबर 2026 को सुनवाई होगी।
यह पूरा मामला वर्ष 2010 का है। आरोप के मुताबिक, तत्कालीन जिला सहकारिता पदाधिकारी डॉ. पारस नाथ प्रसाद ने प्रज्ञा कृषक सेवा स्वावलंबी सहकारी समिति लिमिटेड का निबंधन करने के एवज में परिवादी अजय रंजन से 40 हजार रुपये रिश्वत की मांग की थी। इसकी शिकायत निगरानी अन्वेषण ब्यूरो से की गई थी। शिकायत की जांच के बाद निगरानी की टीम ने जाल बिछाया और 23 जून 2010 को आरोपी अधिकारी को 35 हजार रुपये रिश्वत लेते हुए रंगेहाथ गिरफ्तार कर लिया था।
इस मामले में निगरानी थाना कांड संख्या 48/2010 और विशेष वाद संख्या 17/2010 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। तत्कालीन अनुसंधानकर्ता अमृतेन्दु शेखर ठाकुर, पुलिस उपाधीक्षक, निगरानी अन्वेषण ब्यूरो पटना ने मामले की जांच पूरी कर निर्धारित समय पर आरोपपत्र दाखिल किया था। अदालत में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से कुल नौ गवाहों की गवाही कराई गई।
बिहार सरकार की ओर से प्रभारी विशेष लोक अभियोजक निगरानी, भागलपुर राम बदन कुमार चौधरी ने अदालत में मजबूती से पक्ष रखा। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर विशेष न्यायालय निगरानी के न्यायाधीश दीपक कुमार-01 ने 30 अक्टूबर 2026 को डॉ. पारस नाथ प्रसाद को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 7 और 13(2) सहपठित धारा 13(1)(डी) के तहत दोषी करार दिया।
निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, वर्ष 2026 में अब तक भ्रष्टाचार से जुड़े 24 मामलों में न्यायालय द्वारा लोकसेवकों को दोषी करार दिया जा चुका है। ब्यूरो ने इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी अभियोजन कार्रवाई की बड़ी उपलब्धि बताया है।
आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2000 से 2024 तक के 25 वर्षों में औसतन हर साल 5.6 मामलों में ही दोषसिद्धि हुई थी। वहीं, वर्ष 2026 में अब तक यह आंकड़ा औसत से करीब 4.3 गुना अधिक हो चुका है। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो का कहना है कि भ्रष्टाचार के मामलों में दोषियों को सजा दिलाने के लिए लगातार प्रभावी अभियोजन चलाया जा रहा है।
बिहार में 16 साल पुराने रिश्वतखोरी मामले में आए इस फैसले को भ्रष्टाचार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
मिथिला हिन्दी न्यूज
संपादक: रोहित कुमार सोनू
