मातृ नवमी तिथि का विशेष महत्व, दिवंगत माताओं और महिला पूर्वजों के श्राद्ध का विशेष दिन


पितृपक्ष के दौरान आने वाली नवमी तिथि का सनातन धर्म में विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। इसे मातृ नवमी के नाम से जाना जाता है। पंचांग के अनुसार इस वर्ष मातृ नवमी 04 अक्टूबर, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन दिवंगत माताओं, बहनों, बेटियों तथा महिला पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है।

स्टेशन चौक स्थित हनुमान प्रेम मंदिर के पुजारी पंडित पंकज झा शास्त्री ने बताया कि मातृ नवमी विशेष रूप से उन महिला पूर्वजों के श्राद्ध के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है, जिनका निधन सुहागन रहते यानी पति के जीवित रहते हुआ हो। इसे कई स्थानों पर 'सौभाग्यवती श्राद्ध' अथवा 'अविधवा नवमी' के नाम से भी जाना जाता है। जिन महिला पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए भी इस दिन श्राद्ध एवं तर्पण करने की परंपरा बताई गई है।

मातृ नवमी केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परिवार के निर्माण और संवर्धन में महिलाओं के योगदान को स्मरण करने का अवसर भी माना जाता है। माताएं और परिवार की अन्य महिला सदस्य पीढ़ियों को संस्कार, स्नेह और परंपराओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में इस दिन दिवंगत महिला पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना की जाती है।

पंचांग के अनुसार इस वर्ष मातृ नवमी तिथि का आरंभ 04 अक्टूबर, रविवार को दिन में 07 बजकर 37 मिनट के बाद होगा और तिथि का समापन रात्रि 03 बजकर 02 मिनट पर होगा। इस अवसर पर श्रद्धालु अपनी परंपरा और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध, तर्पण तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठान करेंगे।

पितृपक्ष में मातृ नवमी का यह दिन उन सभी मातृशक्ति और महिला पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का अवसर है, जिनके स्नेह, त्याग और संस्कारों ने परिवार की नींव को मजबूत किया।

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