“एक सुट्टा, दो चाय, मर्द जात हाय-हाय! एक कचौड़ी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा!”—इन दिनों यह तुकबंदी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो और पोस्ट में इस नारे को दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) में हुए एक प्रदर्शन या सभा से जोड़कर बताया जा रहा है, जहां कुछ छात्राओं द्वारा इसे बोलने का दावा किया गया है।
नारे के शब्दों में चाय, कचौड़ी और समोसे जैसे आम खाने-पीने की चीजों का इस्तेमाल करते हुए पुरुषों पर व्यंग्य किया गया है। “मर्द जात हाय-हाय” और “इन मर्दों का क्या भरोसा” जैसे शब्दों के कारण इस नारे को लेकर सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
इस नारे को लेकर आलोचना करने वाले लोगों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति ने अपराध किया है तो उसके अपराध के लिए पूरे पुरुष समाज को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। उनका तर्क है कि किसी अपराध की जिम्मेदारी संबंधित व्यक्ति की होती है और पूरे वर्ग या समुदाय के बारे में सामान्य टिप्पणी से विवाद बढ़ सकता है।
वहीं, प्रदर्शन में शामिल लोगों के संदर्भ में समर्थक इसे महिलाओं की नाराजगी और विरोध दर्ज कराने के एक व्यंग्यात्मक तरीके के तौर पर देख सकते हैं। ऐसे नारों के पीछे किसी विशेष घटना, मुद्दे या प्रदर्शन की पृष्ठभूमि हो सकती है, इसलिए केवल नारे के आधार पर पूरे प्रदर्शन का उद्देश्य तय करना उचित नहीं होगा।
सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले वीडियो और पोस्ट को लेकर यह सावधानी भी जरूरी है कि उनका पूरा संदर्भ, तारीख और मूल स्रोत जांचे बिना किसी दावे को अंतिम तथ्य न माना जाए। किसी प्रदर्शन में नारा लगाया गया हो तो उसके पीछे की वास्तविक मांग और संदर्भ को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
फिलहाल “एक सुट्टा, दो चाय…” वाली यह तुकबंदी सोशल मीडिया पर बहस का विषय बनी हुई है। एक तरफ इसे महिलाओं के विरोध के व्यंग्यात्मक अंदाज के रूप में देखा जा रहा है, तो दूसरी तरफ कुछ लोग इसे पुरुषों के पूरे वर्ग पर टिप्पणी मानकर आपत्ति जता रहे हैं। यही वजह है कि यह छोटा-सा नारा सोशल मीडिया पर बड़ी चर्चा का कारण बन गया है।