पटना स्नातक सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला, वोट बिखरने से रोकने वाला बनेगा ‘सिकंदर’; बदलते समीकरण ने बढ़ाई धड़कनें


पटना। बिहार में आठ सीटों पर हो रहे विधान परिषद चुनाव में पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र इस बार सबसे हॉट सीटों में शामिल हो गया है। चुनावी मैदान में कई प्रत्याशी हैं, लेकिन मुख्य मुकाबले को लेकर लगातार नए राजनीतिक समीकरण बनते-बिगड़ते दिखाई दे रहे हैं। चुनावी गलियारों में अब एक नया नैरेटिव तेजी से चर्चा में है—जो उम्मीदवार अपने समर्थक वोटरों को एकजुट रखते हुए वोटों का बिखराव रोकने में सफल होगा, वही इस चुनाव का ‘सिकंदर’ बनेगा।

चुनाव के शुरुआती दौर में पटना स्नातक सीट पर मुकाबला मुख्य रूप से एनडीए की ओर से जदयू प्रत्याशी नीरज कुमार और जन सुराज के उम्मीदवार अनुज कुमार सिंह के बीच माना जा रहा था। दोनों खेमों ने अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक समीकरण मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी।

लेकिन चुनावी तस्वीर उस समय बदलती नजर आई, जब राजद प्रत्याशी दिलीप कुमार के पक्ष में कुर्मी मतदाताओं की गोलबंदी की चर्चा तेज हुई। इस सामाजिक समीकरण ने मुकाबले को सीधे दो उम्मीदवारों की टक्कर से निकालकर त्रिकोणीय बना दिया है। अब तीनों प्रमुख खेमे अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में वोटों को एकजुट रखने की कोशिश में जुटे हैं।

पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में मुकाबला केवल प्रत्याशियों के व्यक्तिगत जनाधार का नहीं रह गया है। यहां सामाजिक समीकरण, राजनीतिक दलों का समर्थन, व्यक्तिगत संपर्क और सबसे महत्वपूर्ण वोट ट्रांसफर की क्षमता चुनावी परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।

यही वजह है कि उम्मीदवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पक्ष में बने माहौल को मतदान केंद्र तक पहुंचाने और वोटों के बिखराव को रोकने की है। चुनावी रणनीतिकारों की नजर भी इसी पर टिकी है कि कौन प्रत्याशी अपने समर्थक मतदाताओं को आखिरी समय तक अपने साथ रखने में सफल होता है।

एक तरफ एनडीए अपनी राजनीतिक पकड़ और संगठनात्मक ताकत के भरोसे मैदान में है, तो दूसरी तरफ जन सुराज अपने नए राजनीतिक प्रयोग और उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ के जरिए सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है। वहीं राजद सामाजिक समीकरणों को साधकर मुकाबले को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश में है।

बनते-बिगड़ते समीकरणों के बीच अब हर प्रत्याशी का अपना ‘वोट बचाओ अभियान’ चल रहा है। कहीं पुराने समर्थकों को सक्रिय किया जा रहा है, तो कहीं जातीय और सामाजिक समूहों के बीच पहुंच बढ़ाने की कोशिश हो रही है। आखिरी समय में छोटे-छोटे समीकरण भी बड़े चुनावी नतीजे को प्रभावित कर सकते हैं।

पटना स्नातक सीट पर अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या एनडीए अपना वोट बैंक सुरक्षित रख पाएगा? क्या जन सुराज मुकाबले को अपने पक्ष में मोड़ पाएगा? या फिर राजद की सामाजिक गोलबंदी चुनावी समीकरण को पूरी तरह बदल देगी?

फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि इस त्रिकोणीय मुकाबले में जिस उम्मीदवार ने अपने वोट को सबसे मजबूती से संभाल लिया, उसके लिए विधान परिषद की राह आसान हो सकती है। अब सबकी निगाहें चुनावी नतीजे पर हैं कि ‘वोट बचाओ’ की रणनीति किसे पटना स्नातक सीट का असली ‘सिकंदर’ बनाती है।
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