नवरात्रि में केले की बढ़ी मांग, रसायनों से पकाए जा रहे फलों की आशंका; खरीदारी में बरतें सावधानी

मिथिला हिन्दी न्यूज | रोहित कुमार सोनू
नवरात्रि पर्व के दौरान फलों की मांग बढ़ने के साथ ही बाजार में केले की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ने लगी है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु बड़ी संख्या में केले और अन्य फलों का सेवन करते हैं। इसी बीच कम समय में फल बाजार तक पहुंचाने की होड़ में कुछ कारोबारियों द्वारा केले को कृत्रिम तरीके से पकाने की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में उपभोक्ताओं के लिए यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि बाजार में मिलने वाला केला प्राकृतिक रूप से पका है या उसे जल्दी पकाने के लिए रसायनों का इस्तेमाल किया गया है। बाजार में चमकदार और एकसमान पीले रंग के केले देखकर ग्राहक अक्सर उन्हें अच्छी गुणवत्ता का फल समझ लेते हैं। हालांकि, केवल रंग और चमक के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि केला प्राकृतिक रूप से पका है या कृत्रिम तरीके से। फलों को पकाने के लिए कुछ पदार्थों का निर्धारित मानकों के अनुसार इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन प्रतिबंधित रसायनों या नियमों के विरुद्ध उनका प्रयोग स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है। नवरात्रि के दौरान फलों की खपत बढ़ने के कारण बाजार में केले की मांग भी बढ़ जाती है। सामान्य परिस्थितियों में केले को पकने में कई दिन लग सकते हैं, लेकिन जल्द बिक्री और आपूर्ति के उद्देश्य से कुछ व्यापारी पकाने की प्रक्रिया तेज करने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसे में फलों की गुणवत्ता की जांच और खाद्य सुरक्षा नियमों का पालन सुनिश्चित करना जरूरी है। केले को जल्दी पकाने के संदर्भ में एथेफोन टेक्निकल और प्रोपिलीन ग्लाइकोल जैसे रसायनों के इस्तेमाल की चर्चा सामने आ रही है। हालांकि, किसी विशेष बाजार में इन पदार्थों का अनुचित इस्तेमाल हो रहा है या नहीं, इसकी पुष्टि संबंधित विभाग की जांच से ही हो सकती है। किसी पदार्थ का नाम सामने आना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसका इस्तेमाल प्रतिबंधित तरीके से किया गया है। फलों को पकाने में इस्तेमाल होने वाले पदार्थों की गुणवत्ता, मात्रा और उपयोग की विधि निर्धारित खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुरूप होनी चाहिए। गलत तरीके से रसायनों का प्रयोग करने से उपभोक्ताओं की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए कारोबारियों को नियमों का पालन करना चाहिए और संबंधित विभागों को बाजार में बिकने वाले फलों की गुणवत्ता पर नजर रखनी चाहिए। उपभोक्ताओं को केला खरीदते समय केवल उसके चमकीले पीले रंग पर भरोसा नहीं करना चाहिए। फल की ताजगी, सामान्य स्थिति और विक्रेता की विश्वसनीयता पर भी ध्यान देना चाहिए। असामान्य गंध, सड़न या खराब होने के स्पष्ट संकेत वाले फल खरीदने से बचना चाहिए। हालांकि, केले पर हरे या भूरे निशान होना अथवा उसका एकसमान पीला रंग होना अकेले कृत्रिम तरीके से पकाए जाने का प्रमाण नहीं है। केले को खाने से पहले साफ पानी से धोकर छीलना उचित है। इससे छिलके की सतह पर मौजूद गंदगी कम हो सकती है, लेकिन फल के भीतर मौजूद रासायनिक अवशेष हटने की गारंटी नहीं मिलती। यदि किसी फल को लेकर गंभीर संदेह हो, तो उसे खाने से बचें और खाद्य सुरक्षा विभाग को इसकी सूचना दें। नवरात्रि जैसे प्रमुख त्योहारों के दौरान बाजारों में नियमित निरीक्षण, फलों के नमूनों की जांच और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई जरूरी है। इससे उपभोक्ताओं को सुरक्षित फल उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। त्योहार के मौसम में श्रद्धालुओं की सेहत का ध्यान रखना कारोबारियों और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है। मिथिला हिन्दी न्यूज | संपादक: रोहित कुमार सोनू
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