“मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की”—अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच चल रही सियासी तनातनी पर यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती दिखाई दे रही है। विवाद को शांत करने की कोशिशों के बीच अब मामला और ज्यादा तल्ख होता जा रहा है। अनंत सिंह ने अपने विरोधी के “मर्ज” का इलाज करने के लिए अब ‘पुदीना’ खिलाने की बात कहकर सियासी तापमान और बढ़ा दिया है।
फिलहाल हालात ऐसे हैं कि दवा के ओवरडोज का खतरा नजर आने लगा है। मामला इधर जाए या उधर, राजनीतिक नुकसान की आशंका दोनों तरफ है। अनंत सिंह के लिए शायद दांव अब प्रतिष्ठा से ज्यादा सीधे राजनीतिक टकराव का बन चुका है। यही वजह है कि वे बिना किसी अंजाम की परवाह किए अपने अंदाज में खुलेआम मोर्चा लेते नजर आ रहे हैं।
नीरज कुमार को सार्वजनिक रूप से ललकारकर अनंत सिंह ने सिर्फ अपने विरोधी को ही चुनौती नहीं दी, बल्कि पूरे जदयू कुनबे को असहज कर दिया है। हालांकि अनंत सिंह पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि उनकी लड़ाई पार्टी से नहीं, बल्कि सिर्फ नीरज कुमार से है। वे नीतीश कुमार के प्रति अपनी निष्ठा भी जताते रहे हैं।
लेकिन राजनीति में सिर्फ नीयत काफी नहीं होती, उसके असर भी देखे जाते हैं। अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच बढ़ता टकराव अब सीधे तौर पर जदयू नेतृत्व के लिए भी चुनौती बनता दिख रहा है। अनंत सिंह ने भले ही अपनी लड़ाई को व्यक्तिगत बताते हुए पार्टी से अलग रखा हो, लेकिन इस संघर्ष की राजनीतिक आंच नीतीश कुमार तक पहुंचना स्वाभाविक है।
अब मुकाबला महज दो नेताओं के बीच की बयानबाजी नहीं रह गया है। यह आने वाले राजनीतिक समीकरणों और शक्ति प्रदर्शन की परीक्षा बनता जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर अनंत सिंह के अनुज चुनावी मैदान में बाजी मारते हैं, तो इसे सिर्फ नीरज कुमार की हार माना जाएगा या फिर इसके राजनीतिक मायने इससे कहीं बड़े होंगे?
यही वजह है कि अनंत-नीरज विवाद अब एक स्थानीय राजनीतिक टकराव से आगे बढ़कर जदयू के भीतर शक्ति संतुलन और नेतृत्व की साख से जुड़ा सवाल बनता जा रहा है।