दीपावली आते ही देश के कई राज्यों में पटाखों को लेकर सख्ती शुरू हो जाती है। कहीं पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया जाता है, कहीं ऑनलाइन बिक्री पर रोक लगती है, तो कहीं बेरियम युक्त पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल पर पाबंदी रहती है। इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि पटाखों से वायु प्रदूषण बढ़ता है और लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है।
पर एक सवाल है, जिसका जवाब सरकार और व्यवस्था से मांगना जरूरी है। अगर पटाखों का धुआं इंसानों की सेहत के लिए खतरनाक है, तो फिर सिगरेट के जहरीले धुएं को लेकर वैसी ही सख्ती और गंभीरता क्यों नहीं दिखाई देती?
सिगरेट का धुआं केवल पीने वाले व्यक्ति को ही नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि उसके आसपास खड़े लोगों को भी प्रभावित करता है। सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट पीने से दूसरे लोग भी अनचाहे धुएं के संपर्क में आते हैं। बच्चे, बुजुर्ग और सांस संबंधी परेशानियों से जूझ रहे लोगों के लिए यह स्थिति और भी चिंताजनक हो सकती है।
पटाखों पर नियंत्रण होना चाहिए, क्योंकि पर्यावरण और लोगों की सेहत की रक्षा जरूरी है। लेकिन क्या प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई सिर्फ त्योहारों तक सीमित रहनी चाहिए? क्या साल के बाकी 365 दिनों में हवा को जहरीला बनाने वाले दूसरे स्रोतों पर सवाल नहीं उठने चाहिए?
दीपावली साल में एक बार आती है, लेकिन सिगरेट का धुआं रोजाना सार्वजनिक स्थानों, सड़कों, चाय की दुकानों और कई अन्य जगहों पर देखने को मिलता है। ऐसे में प्रदूषण के खिलाफ कार्रवाई भी पूरे साल समान गंभीरता से होनी चाहिए।
यह सवाल पटाखों की वकालत करने या सिगरेट को सही ठहराने का नहीं है। सवाल है समान जिम्मेदारी और समान जागरूकता का। पर्यावरण की चिंता अगर वास्तव में है, तो हर तरह के प्रदूषण पर ईमानदारी से कार्रवाई होनी चाहिए।
सरकार को पटाखों के साथ-साथ तंबाकू नियंत्रण, सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान प्रतिबंध और जागरूकता अभियान को भी प्रभावी बनाना चाहिए। नियम केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने चाहिए।
आखिर सवाल यही है कि जब कुछ दिनों के पटाखों के धुएं पर इतनी सख्ती हो सकती है, तो सालभर लोगों की सांसों में घुल रहे सिगरेट के धुएं के खिलाफ उतनी गंभीरता क्यों नहीं दिखाई देती?
स्वच्छ हवा किसी त्योहार की सुविधा नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार है।
मिथिला हिन्दी न्यूज | रोहित कुमार सोनू
संपादक: रोहित कुमार सोनू
👁️ अब तक पढ़ा गया:
बार